गीता प्रेस : सनातन धर्म का अमर स्तंभ

गीता प्रेस विश्व का सबसे बड़ा मुद्रण संस्थान है, जो विशेष रूप से सनातन धर्म के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से कार्यरत है। यह लेख गीता प्रेस पर एक स्वतंत्र समीक्षा है, जिसमें यथासंभव निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया गया है। गीता प्रेस को समाज भली-भांति जानता है, अतः इसके परिचय की आवश्यकता नहीं है।

Geetapress- Gorakhpur

फिर भी यह कहना अनुचित न होगा कि गीता प्रेस सनातन धर्म की रक्षा और प्रचार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। लेखक का मानना है कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए गीता प्रेस का संरक्षण अत्यावश्यक है, और इसके लिए सभी सनातन प्रेमियों को सदैव तत्पर रहना चाहिए।

यह लेख गीता प्रेस से जुड़े अनेक प्रश्नों के उत्तर स्वतंत्र रूप से देने का प्रयास है। यह किसी प्रकार से गीता प्रेस का प्रचार नहीं, बल्कि उस संस्था के कार्यों का विश्लेषण है – क्योंकि गीता प्रेस स्वयं का नहीं, सनातन सत्य का प्रचार करता है। यदि आज सनातन धर्म का आधार उसका साहित्य है, तो यह कहना अनुचित नहीं होगा कि उस साहित्य का आधार गीता प्रेस है।


गीता प्रेस की आवश्यकता

आज भारत के लगभग प्रत्येक सनातन परिवार में धर्म से संबंधित कुछ न कुछ पुस्तकें अवश्य मिलती हैं। परंतु प्राचीन काल में ऐसा नहीं था। तब अधिकांस श्रीमद्भागवत गीता, रामायण, भागवत पुराण, शिवपुराण आदि ग्रंथों को जानने या सुनने के लिए किसी ज्ञानी व्यक्ति पर निर्भर रहना पड़ता था।

प्राचीन काल में शास्त्र विषेश कर भोजपत्र पर लिखे जाते थे। परंतु जब आक्रांताओं ने देश पर शासन किया, तो उन्होंने हमारी संस्कृति और ग्रंथों को नष्ट करने का भरसक प्रयास किया। अंग्रेजों के शासनकाल में भी भारतीय साहित्य को विकृत करने और भ्रम फैलाने की कोशिशें की गईं।

किन्तु सौभाग्य से भारतभूमि पर ऐसे महान महापुरुषों का जन्म हुआ, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर संस्कृति की रक्षा की। सनातन धर्म का प्रत्येक अनुयायी उन महात्माओं का सदैव ऋणी रहेगा।

आदि शंकराचार्य के प्रादुर्भाव का कारण सबको ज्ञात है। यदि उनका दिव्य अवतरण न होता, तो संभवतः भारत की संस्कृति लुप्त हो जाती। उन्होंने ही धर्म को पुनः स्थापित किया और ग्रंथों का विस्तार किया।


सेठ जयदयाल जी गोयनका : गीता प्रेस के प्राण

सेठ श्री जयदयाल जी गोयनका – जो अब ब्रह्मलीन हैं – उनका प्रत्येक शब्द आज भी जन-जन के लिए प्रेरणा बना हुआ है। वे एक गृहस्थ संत थे, किंतु व्यवहार और आचरण से अवतार पुरुष के समान थे। उनके जीवन में न दिखावा था, न चमत्कार। वे जादू और आडंबर से दूर रहकर ज्ञान और सेवा में समर्पित थे।

श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि गीता प्रचारक सर्वोच्च ईश्वर भक्त होता है, और यदि किसी को इस पदवी के योग्य माना जा सकता है, तो निस्संदेह सेठ जयदयाल जी गोयनका हैं।


गृहस्थ संत

यद्यपि मैं व्यक्तिगत रूप से सेठ जी से कभी नहीं मिला, परंतु उनके साहित्य – विशेषकर “श्रीमद्भागवत गीता तत्व विवेचनी” – से उनके विचारों को निकट से जान पाया हूँ। मेरे जीवन में यदि श्रीमद्भागवत गीता का प्रकाश है, तो उसमें सेठ जी के शब्दों की ज्योति भी समाहित है।

“संत” शब्द बहुत पवित्र और गंभीर है। यह किसी वस्त्र या चोले से नहीं, बल्कि व्यक्ति के स्वभाव और आचरण से परिभाषित होता है। जो व्यक्ति निस्वार्थ भाव से लोककल्याण के लिए कार्य करता है, वही सच्चा संत है।

सेठ जी के प्रवचन पूर्ण रूप से श्रीमद्भागवत गीता के सार पर आधारित हैं। उन्होंने कभी अपने मत को दूसरों पर नहीं थोपा। संत वही है, जो आचरण से संत हो, चाहे वह किसी भी स्थिति या स्थान में क्यों न हो।


गीता प्रेस की चर्चा

गीता प्रेस अपने आप में ही एक पहचान है। यह समाज के लिए, समाज के द्वारा चलने वाला संगठन है। आज अनेक संस्थाएं समाज सेवा का दावा करती हैं, परंतु बहुत कम संगठन वास्तव में निस्वार्थ भाव से समाज के लिए समर्पित हैं।

गीता प्रेस का हर कार्य श्रीमद्भागवत गीता के “निष्काम कर्मयोग” सिद्धांत पर आधारित है। यहां के ट्रस्टी या सहयोगी किसी प्रकार का पारिश्रमिक नहीं लेते। यह संस्था पूर्ण रूप से समर्पण, सेवा और धर्मभाव पर आधारित है।

प्रकाशन के क्षेत्र में गीता प्रेस का कोई मुकाबला नहीं है। यदि आज समाज में सनातन साहित्य का इतना व्यापक प्रसार है, तो उसका श्रेय गीता प्रेस को ही जाता है।


गीता प्रेस और ईश्वरीय योजना

श्रीमद्भागवत गीता में भगवान कहते हैं—

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”

अर्थात जब-जब इस पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं अवतार लेकर आता हूँ।

यह श्लोक केवल भगवान के अवतार की नहीं, बल्कि उस ईश्वरीय ऊर्जा की व्याख्या करता है जो समय-समय पर धर्म की रक्षा हेतु विभिन्न रूपों में प्रकट होती है।
कभी वह कृष्ण बनकर आती है, कभी राम, कभी शंकराचार्य, और कभी सेठ जयदयाल जी गोयनका बनकर – ताकि गीता का संदेश मानवता तक पहुँचे।
गीता प्रेस उसी ईश्वरीय योजना का एक मूर्त रूप है।


गीता प्रेस का मत और संप्रदाय

समाज में मत और संप्रदाय को लेकर अनेक भ्रांतियाँ हैं। हर व्यक्ति अपने मत को श्रेष्ठ मानता है। परंतु ईश्वरीय दृष्टि में मत और संप्रदाय में बड़ा या छोटा कुछ नहीं है।
वास्तव में ईश्वर ने न कोई जाति बनाई, न संप्रदाय।

वर्णाश्रम व्यवस्था व्यक्ति के आचरण के आधार पर थी, जन्म के आधार पर नहीं।
जैसा कि कहा गया है—

“विद्यां ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।”
(विद्या विनम्रता देती है, और विनम्रता व्यक्ति को पात्र बनाती है।)

दुर्भाग्यवश, अतीत में कुछ अल्पज्ञ लोगों ने शास्त्रों के सिद्धांतों का दुरुपयोग कर समाज को विभाजित किया। परंतु जन्म से कोई जाति नहीं होती; जन्म से केवल मानव होता है और उसे मानवता सिखना पड़ता है।


यह गीता प्रेस की विशिष्टता है। गीता प्रेस किसी मत, संप्रदाय या व्यक्ति का विरोध नहीं करता।
यह संस्था केवल उन तत्वों से दूरी रखती है जो शास्त्र-विरोधी हैं या समाज में भ्रम फैलाते हैं।
गीता प्रेस का उद्देश्य सनातन भारत की मूल आत्मा को अक्षुण्ण रखना है।

गीता प्रेस से प्रकाशित प्रत्येक लेख और ग्रंथ को गहन अध्ययन और परीक्षण के बाद ही प्रकाशित किया जाता है। इसलिए इसके साहित्य पर संशय करने का कोई कारण नहीं है।


आग्रह विचार
गीता प्रेस आज विश्व में सनातन साहित्य का सबसे विश्वसनीय और अग्रणी केंद्र है।
लेखक इस संस्था के सभी ट्रस्टी, सहयोगियों और संतों को हृदय से धन्यवाद ज्ञापित करता है।
यह लेख श्रीमद्भागवत गीता के आशीर्वाद से लिखा गया है। यदि इसमें किसी प्रकार की त्रुटि रह गई हो, तो पाठक कृपया क्षमा करें और मार्गदर्शन प्रदान करें।

गीता प्रेस की किताब डाउनलोड ( Download )करने के लिए तथा अधिक जानकारी के लिए गीता प्रेस की वेबसाइट पर जाएं – please click

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