हमारा वास्तविक मित्र

मित्रता को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि मित्र कौन होता है और मित्र किसे कहते हैं। मित्र के प्रकार अनेक होते हैं, परंतु वेदों में कहा गया है कि वही व्यक्ति मित्र कहलाता है जो हमारे लिए शुभ सोचे, आवश्यकता पड़ने पर साथ दे और मार्गदर्शन करे।

वेद में एक प्रसिद्ध श्लोक है—

।। विद्या मित्रं प्रवासेषु, भार्या मित्रं गृहेषु च।
रुग्णस्य औषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च।।

अर्थ:
प्रवास का मित्र विद्या है, घर का मित्र पत्नी है, रोगी का मित्र औषधि है और मृत्यु के बाद मित्र केवल धर्म होता है।

हमारा वास्तविक मित्र

वेद-दर्शन मित्र के चार विशेष रूपों को स्पष्ट करता है—

1. प्रवास का मित्र


2. घर का मित्र


3. रोगी का मित्र


4. मृत्यु के बाद का मित्र






1. प्रवास का मित्र — विद्या

वेद ज्ञान को प्रवास का सर्वोत्तम मित्र बताते हैं।
प्रवास वह अवस्था है जब व्यक्ति अपने घर, परिवार और परिचितों से दूर किसी नई जगह पर रहता है। ऐसी स्थिति में उसके पास जान-पहचान और सहयोगी कम होते हैं। तब व्यक्ति की सबसे बड़ी सहायता उसका ज्ञान और बुद्धि ही करते हैं।

यदि ज्ञान शुद्ध और सत्य पर आधारित हो, तो वह व्यक्ति को सही दिशा में ले जाता है। परंतु यदि ज्ञान दूषित हो, बुरे वातावरण में पला बढ़ा हो, तो व्यक्ति आसानी से भ्रमित हो जाता है।
इसी कारण वेद शास्त्र सदैव उत्तम ज्ञान और सत्संग चुनने की प्रेरणा देते हैं।

एक बच्चे पर उसके वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ता है। दूषित वातावरण उसके ज्ञान को भी दूषित कर देता है। इसलिए सदैव अच्छे वातावरण में रहना आवश्यक है।




2. घर का मित्र — पत्नी

वेद-दर्शन के अनुसार घर का सर्वोत्तम मित्र पत्नी होती है।
यह सत्य है कि स्त्री घर में अधिक समय व्यतीत करती है और परिवार की परिस्थितियों को पुरुष की अपेक्षा अधिक सूक्ष्मता से समझती है। पुरुष के विचारों का क्षेत्र प्रायः व्यापक होता है, जब कि पत्नी का चिंतन परिवार, बच्चे और घर के केंद्र में होता है।

यद्यपि पति-पत्नी के बीच कई बार अहंकार, गलतफहमी या आदतों के कारण विवाद होते हैं, लेकिन इसके बावजूद घर के मामलों में पत्नी जैसा विश्वसनीय मित्र कोई नहीं हो सकता।

आज स्वार्थ के युग में बहुत कम लोग घर और समाज के हित में सोचते हैं। परंतु यदि व्यक्ति समाज के प्रति गलत करता है, तो उसका दुष्प्रभाव उसके अपने घर पर भी पड़ता है, क्योंकि घर और समाज एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।




3. रोगी का मित्र — औषधि

एक रोगी का सबसे बड़ा मित्र उसकी औषधि है।
बहुत बार रोगी अनुशासनहीनता के कारण दवा की उपेक्षा कर देता है और वर्जित भोजन के प्रति आकर्षित हो जाता है। इस स्थिति में दवा उसे ठीक करती है, जबकि अनुचित भोजन उसे और बीमार बना देता है।

इस प्रकार वेद कहते हैं कि रोगी का सच्चा मित्र औषधि ही है।




4. मृत्यु के बाद का मित्र — धर्म

जीवन में हमारे अनेक मित्र हो सकते हैं, परंतु मृत्यु के बाद केवल धर्म ही साथ जाता है।

यहां धर्म का अर्थ जाति या पंथ से नहीं है।
धर्म का अर्थ है—
कर्तव्य, नैतिकता, उचित व्यवहार, और हर संबंध का अपना-अपना उत्तरदायित्व धर्म।

उदाहरण के लिए—

माँ का पुत्र के प्रति धर्म

पुत्र का पिता के प्रति धर्म

पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति धर्म

प्रजा का राजा के प्रति और राजा का प्रजा के प्रति धर्म

कलाकार का अपनी कला के प्रति धर्म


ये धर्म किसी जाति-विशेष से जुड़े नहीं—ये तो प्रत्येक व्यक्ति के जन्मजात कर्तव्य हैं।

जब व्यक्ति अपने धर्म (कर्तव्य) को छोड़ देता है, तभी उसका पतन होता है।
समाज जिन धर्मों को धर्म मानता है, वे कभी-कभी संपूर्ण समुदाय को हानि पहुँचा सकते हैं, परंतु व्यक्तिगत धर्म का त्याग व्यक्ति को ही हानि पहुँचाता है।

मृत्यु के बाद मनुष्य केवल अपने कर्म और अपने विचारों की पोटली साथ लेकर जाता है।

यमदूत और देवदूत भी कोई बाहरी प्राणी नहीं—
मनुष्य स्वयं अपने पाप-पुण्य का मूल्यांकन करता है।
वह जानता है कि उसने क्या किया और किस परिणाम का वह पात्र है।




निष्कर्ष अमृत

वेद बताते हैं कि—

प्रवास में हमारे मित्र विद्या है,

घर में पत्नी,

बीमारी में औषधि,

और मृत्यु के बाद धर्म।


वास्तविक मित्र वही है,
जो जीवन के विभिन्न चरणों में हमें संभाले, मार्गदर्शन दे और कल्याण की ओर ले जाए।

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