मनुष्य जिस वर्ण,धर्म,आश्रम,संप्रदाय, वेश-भूषा आदि में है। वह वहीं रहते हुए परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।
परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज।
स्वामी श्री ने स्पष्ट कहा है व्यक्ति किसी भी वर्ण धर्म आश्रम का पालन करता हो। किसी भी संप्रदाय से हो अथवा किसी भी वेशभूषा में रहने वाला हो। वह वहीं उसी स्थिति में रहते हुए परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।
परमात्मा को प्राप्त करने के लिए किसी वर्ण-धर्म को बदलने की आवश्यकता नहीं है। किसी एक संप्रदाय को छोड़कर दूसरे संप्रदाय में जाने की भी आवश्यकता नहीं है। किसी प्रकार वेशभूषा भी बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ता है।
कहते हैं गुरु की वाणी में अनेक अर्थ होते हैं। बशर्ते की गुरु की वाणी पर चिंतन-विचार किया जाए। त्याग और सरलता की मूर्ति स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज को आज शायद ही कोई परमेश्वर भक्त हो जो नहीं जानता है। उन्होंने एक से एक रहस्य को सरलता से कहा और दृढ़ता से कहा।
जो भी स्वामी जी के लिए समर्पण का भाव रखते हैं। उन्हें और किसी की वाणी नहीं समझ में नहीं आती। स्वामी जी के बारे में कितना भी कहा जाए कम होगा। अभी हम बात कर रहे हैं उनके विचारों की।
स्वामी जी ने सदैव कहा ” तुमने ईश्वर के साथ अपना रिश्ता जोड़ा ही नहीं है। ईश्वर किसी एक का नहीं है वह सबका है। तुमने आज तक जिसे अपना मान रखा है जबकि वह अपना नहीं है फिर भी तुम सदैव उसे अपना मानते हो। उसी प्रकार उस ईश्वर से अपना रिश्ता जोड़ लो। यह मन में दृढ़ निश्चय कर लो आज से ईश्वर तुम्हारे हैं और तुम ईश्वर के हो।
शेष जिनको तुम अपना मानते हो वे असलियत में तुम्हारे अपने नहीं है। तुम कुछ भी कर लो तुम सबको छोड़ कर जाओगे। तुम करो सबके लिए परंतु जीयो सिर्फ ईश्वर के लिए। वर्ण-धर्म आश्रम बदलने जाओगे और भ्रम में पड़ जाओगे। उस ईश्वर को सभी वर्ण-धर्म संप्रदाय पूर्ण रूप से स्वीकार है। तुम जिस वेशभूषा में रहते हो वह परमात्मा तुम्हें इस वेशभूषा में स्वीकार कर लेगा।
तुम पहले ईश्वर को स्वीकार करो। तुम ईश्वर के हो और ईश्वर तुम्हारा है। रात दिन रट लगाओ , हे मेरे नाथ किसी भी स्थिति में मैं तुम्हें भूलूं नहीं। यदि मैं भूलना भी चाहूं तो तू मुझे भूलने ना देना। बस एक काम करो! आज ही ईश्वर से अपना रिश्ता जोड़ लो। उसको खोजने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। जहां तुम हो! ईश्वर वहीं है, वह हीं प्राप्त होगा और तुम्हारे लिए वहीं प्रस्तुत हो जाएगा।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।
।।६१।।
इसलिए ईश्वर के लिए तीव्र उत्कंठा हो तो ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है, किन्तु पहले तो मनुष्य प्रायः यही तय नहीं कर पाता कि ईश्वर है भी या नहीं! तो उत्कंठा होना तो और भी दूर की बात है। और अगर मिल भी जाए तो पहचानेंगे कैसे! और सवाल यह भी है कि क्या ईश्वर की हमें कोई जरूरत भी है? श्रीरामकृष्ण परमहंस कहते हैं कि जल में डूबता व्यक्ति जैसे साँस के लिए व्याकुल होता है वैसी व्याकुलता ईश्वर की प्राप्ति जब तक न हो तब तक ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती। यह व्याकुलता गौण है। मुख्य बात है संसार से मन बुरी तरह उचट जाना। ईश्वर की प्राप्ति का प्रश्न इसके बाद की बात है।
आपका विचार गहन चिंतक को प्रकट करता है। एक गहन चिंतक उत्तम साधन होता है। मेरे विचार कुछ लंबे हो सकते हैं। शब्दों में त्रुटियां भी हो सकता है। मेरे शब्द कुछ अटपटे लगे तो इसके लिए मैं अग्रिम में खेद प्रकट करता हूं। मैं चिंतन से भावार्थ में सदैव सरलता की कोशिश करता हूं।
बिना इच्छा के प्रायः इंसान कर्म नहीं करता। यहां विचारणीय बात है संसार के प्रति मोह रूपी भ्रम जाल जीव स्वयं अपने इच्छा के अनुरूप तैयार करता है। या इसे आप प्रकृति के अनुरूप तैयार होना भी कह सकते हैं। जिसे तोड़ पाना पसबके लिए संभव नहीं होता। यह भ्रम-जाल उसी का टूटता है जिसका प्रेम ईश्वर के लिए प्रगाढ़ हो जाता है या फिर किसी प्रकार संसार रूपी भ्रम-जाल माया से मोह भंग होता है। यह प्रक्रिया अचानक नहीं हो पाता। भक्त जब तक अपनी भावना से प्रकृति में स्थित रहेगा तब तक वह ईश्वर से दूर रहेगा। ईश्वर को पाने की उत्कंठा अथवा ईश्वर को जानने की जिज्ञासा भक्त को ईश्वर के करीब लेकर जाता है। अध्यात्म रामायण में एक कथन है “मन हीं संसार है और मन ही बंधन है।” मन बहुत हठी है, चंचल है यह सब कोई जानता है। इसीलिए अधिक से अधिक ईश्वर चिंतन का बात कहा गया है।
मेरा स्वयं का विश्वास है। मैं अंत: करण से प्रार्थना को विशेष मानता हूं। यदि ईश्वर के ऊपर भरोसा नहीं है और भक्त बार-बार कहे कि मुझे तेरे ऊपर भरोसा नहीं है तो ईश्वर भरोसा भी दे देता है। यदि कोई भक्त यह भी कहे कि मैं तेरे किसी रूप को वास्तव में नहीं जानता और यही दिन रात रट लगा दें। ऐसे में ईश्वर स्वयं आगे चलकर उसे रास्ता दिखा देता है। एक भक्त रात दिन ईश्वर से प्रार्थना करें कि मुझे सांसारिक भोगों के प्रति व्याकुलता नहीं चाहिए मुझे तो सिर्फ तेरे प्रेम की व्याकुलता चाहिए। ईश्वर बहुत जल्द हीं वह व्याकुलता भी प्रदान कर देता है। 🙏🙏
आप ठीक कहते हैं। धन्यवाद।।