भगवान और मंदिर क्यों चाहिए? सनातन संस्कृति में भगवान और मंदिर का महत्व किसी से छिपा हुआ नहीं है। यह सवाल उठता है,कुछ प्रतिशत लोगों के अविश्वास से। एक सवाल अनेक महत्वपूर्ण सवाल को जन्म देता है, जिसे जानना प्रत्येक सनातन अनुयाई को अवश्य है।
“क्या वाकई में भगवान है, और वह भी है! तो कहां छूप कर रहता है? और यदि नहीं है तो उसकी जरूरत क्यों? क्या भगवान वास्तव में मंदिर में हीं रहता है। और यदि भगवान मंदिर में नहीं रहता है,तो फिर कौन रहता है? और उस भगवान को क्या मंदिर चाहिए और यदि चाहिए तो क्यों चाहिए?” ऐसे कुतर्क के जरिए हजारों सवाल खड़े किए जा सकते हैं।

जो स्वयं के अनुभव से नहीं समझ सकता,वास्तव में उसे कोई समझा भी नहीं सकता। इन प्रश्नों का समीक्षा चिंतन देखते हैं।
एक ईश्वर भक्त जानता है।ईश्वर का महत्व क्या है? जो ईश्वर को समझता है ,जो ईश्वर को देखता है ,जो ईश्वर को महसूस करता है। वह समझता है कि भगवान और मंदिर क्यों चाहिए?
जिन्हें ईश्वर पर यकीन नहीं, जो यह मान हीं नहीं सकते कि ईश्वर! मूर्ति में भी हो सकता है। जो मान हीं नहीं सकते, ईश्वर शालिग्राम में पूर्ण रूप से विराजमान है। जो पत्थर को महज पत्थर समझते हैं। आत्मा को ईश्वर से अलग समझते हैं। जिन्होंने अपनी दृष्टि एक दृष्टि में बांध रखा है। वह ईश्वर के स्वरूप को नहीं समझ सकते। जिनका श्रद्धा ईश्वर के स्वरूप में नहीं है,उन्हें मंदिर में भी श्रद्धा नहीं हो सकता। ऐसा व्यक्ति ना भक्ति समझता है और न हीं भक्ति के द्वारा प्राप्ति समझता है। ऐसे लोग ईश्वर और मंदिरों पर श्रद्धा कम हो इसके लिए नाना प्रकार के सवाल उठाते रहते हैं।
ईश्वर! वास्तव में किसी एक का गुलाम नहीं हो सकता,जो कोई उसे अपने नाम में बांधकर पाले में रख ले। जन्म के पश्चात शिशु का नामकरण होता है। कोई भी शिशु! नाम लेकर, जातिवाद! लेकर, धर्म! लेकर जन्म नहीं लेता।
जाति, धर्म, संप्रदाय, समूह! यह सब मिलकर शिशु को एक प्रपंच में बांध देते हैं। प्रपंच में बांधने का अर्थ यह नहीं है कि वेक् गलत है। नाम तो देना हीं होगा! क्योंकि जन्मा हुआ शिशु समाज में बेनाम नहीं रह सकता।
जन्मे हुए शिशु का नामकरण करने का अधिकार! सिर्फ परिवार रखता है। जन्मे हुए शिशु और माता पिता, परिवार के बीच में कोई और नहीं जा सकता। यह वास्तविक लगता है कि जब बच्चे का नया नाम देना हो तो मां-बाप परिवार अपनी स्वेच्छा से कोई भी नाम दे दें।
ईश्वर के ऊपर किसी धर्म और व्यक्ति का कॉपीराइट नहीं हो सकता। कोई यह नहीं कह सकता कि ईश्वर का मैं नामकरण कर चुका हूं, तुम उस ईश्वर का कोई और नाम नहीं रख सकते। ईश्वर का नाम क्या होना चाहिए, ईश्वर का स्वरूप क्या होना चाहिए? यह वास्तव में भक्तों के ऊपर हीं छोड़ देना चाहिए।
जो ईश्वर की भक्ति नहीं करता अथवा किसी और स्वरूप,नाम के पीछे हो! वह दूसरे को कैसे कह सकता है कि मेरा हीं एक ईश्वर है! तुम दूसरे ईश्वर को याद नहीं कर सकते। मेरे ईश्वर के रहते तुम दूसरे ईश्वर को सम्मान नहीं दे सकते।
“वेदांत दर्शन यह स्पष्ट शब्दों में कहता है। जिसने ईश्वर को देखा है अथवा ईश्वर को समझा है। वह वास्तव में किसी को दिखा नहीं सकता अथवा उस ईश्वर को! किसी को समझा नहीं सकता।”
सनातन धर्म में ईश्वर को मानने की अपनी स्वेच्छा है। एक भक्त स्वयं से निश्चित करता है। एक भक्त अपने चरित्र के अनुसार ईश्वर को देखता है। भक्त अपने अनुसार से ईश्वर का नाम निश्चित करता है। सनातन संस्कृति के सनातन धर्म में जिस महात्मा ने ईश्वर को समझा अथवा ईश्वर को देखा! उसने किसी को बाध्य नहीं किया कि ईश्वर का स्वरूप एक हीं है,अथवा ईश्वर का नाम एक हीं है। वास्तव में वह ईश्वर तो सहस्त्रनाम उसे सर्व जगत में व्याप्त है।
वास्तव में अनंत रूपों से युक्त और अनंत नामों से युक्त ईश्वर तो एक हीं है। ईश्वर कितना महान है। इसी से पता चलता है, उस ईश्वर को जिस किसी ने समझाने की और दिखाने की कोशिश की, आज वह ईश्वर के सदृश्य संसार में सम्मान पाता है। ईश्वर का कोई भी भक्त ने यह नहीं कहा, मैं ही ईश्वर हूं मेरी पूजा करो। यही मेरा ईश्वर है, यही एक सबका ईश्वर है। सिर्फ इसी का पूजा करो और बाकी सब को भूल जाओ।
आज भारत में सनातन संस्कृति के अंदर अनेक पंथ और संप्रदाय हैं।वास्तव में देखें तो किसी भी पंथ,संप्रदाय के मुखिया ने यह नहीं कहा की हम एक नया पंथ और संप्रदाय का निर्माण कर रहे हैं।
वह महामानव! वास्तव में महान थे इसलिए आज संसार में स्वेच्छा से उनको ईश्वर प्रेमी मानने के लिए अनेक भक्त मौजूद है।यदि पंथ संप्रदाय के बारे में चिंतन करें तो यह सब प्राकृतिक है और इनका विस्तार अपने आप से हुआ है। यह सनातन संस्कृति की खूबसूरती है।
“मैंने ईश्वर को देख लिया अब सब मान लो! यही ईश्वर है। मैंने जो कह दिया, मैंने जो बोल दिया सिर्फ वही सुनो। मेरे बोलने के अलावा और कोई सत्य है ही नहीं, मैंने जो लिख दिया वह मेरे जैसा कोई और आकर मिटा भी नहीं सकता अथवा ईश्वर सिर्फ मेरे द्वारा लोगों की सुनेगा अन्यथा वह किसी की नहीं सुनेगा।” ऐसा कोई स्वार्थी अथवा मूर्ख हीं कह सकता है।
ऐसा कैसे हो सकता है। ऐसी बातों को स्वीकार करना मूर्खता को स्वीकार करने के बराबर। कोई ऐसा कैसे मान लें , की तुमने ईश्वर को देख लिया। वह ईश्वर सिर्फ तुम्हारे इशारों पर चलने वाला कैसे हो सकता है। ईश्वर को कोई गुलाम नहीं बना सकता। मैं कहूं कि वह ईश्वर सिर्फ मेरी सुनता है । इसका तो मतलब हुआ कि वह ईश्वर मेरा गुलाम बन चुका है। ऐसा कभी नहीं हो सकता, जो सोचते हैं वह महामूर्ख है अथवा समाज को मूर्ख बनाने वाले हैं।
जैसे गणतंत्र देश में प्रत्येक नागरिक का अधिकार समान होता है,वैसे हीं ईश्वर के सामने अथवा इस प्रकृति में सभीं जीवो का अधिकार समान है। सभीं जीवों की अपनी-अपनी दुनिया है। जितना अधिकार हमारे जीनें पर है! उतना हीं अधिकार दूसरे जीवों को भी है। हम इंसान होकर कितने भी बलशाली और बुद्धिमान क्यों ना हो जाए। वृद्धावस्था के बाद मृत्यु निश्चित है। ठीक वैसे हीं दूसरे जीवों की भी जन्म और मृत्यु होता है।
मानव से धरती के दूसरे जीवों से तुलना
समाज के हम मानव की यह खूबी है कि हमें अपना! अच्छा लगता है दूसरे के मुकाबले। अपना जाति प्यारा है, अपना धर्म प्यारा है, हमारा समुदाय सबसे अच्छा है।
देश की दृष्टि से देखें,तो गोरे को गोरा अच्छा लगता है और काले को काला अच्छा लगता है। सभीं अपनी प्रकृति में वही महसूस करते हैं,जो हम करते हैं। यह प्रकृति का नियम है, एक नाटे व्यक्ति को लंबा पसंद नहीं आता। एक लंबे व्यक्ति को नाटा पसंद नहीं आता। यह व्यक्तिगत ऐब नहीं है। यदि चिंतन से देखें तो ऐसा नहीं होता, तो हर एक के जीवन में समान रूप से खुशी और गम नहीं होते।
कोई मानव सुंदर है इसलिए उसे दुख नहीं मिलेगा। कोई व्यक्ति अनुपात में धनी है उसे दुख नहीं मिलेगा। कोई लाचार और गरीब है इसलिए उसे सुख नहीं मिलेगा। कोई रूप से सुंदर नहीं है उसे सुंदरता का आनंद नहीं मिलेगा। ऐसा भावना! यदि किसी के अंदर हो तो वह भ्रम में जीवित है।
आनंद किसे मिलेगा और आनंद कहां
एक बच्चा सोचता है! बड़े होकर आजाद हो जाऊंगा कोई बोलने वाला ना होगा। जब वह बड़ा होकर आजाद हो जाता है। वह न दिखने वाला बेड़ियों में जकड़ जाता है। इसके बारे में एक वृद्ध! वास्तविक अनुभव व्यक्त करता है। पूरे जीवन में कल आनंद मिलेगा, इस कल्पना में व्यक्ति अपना समस्त जीवन गुजार देता है।
व्यक्ति रोज कल्पना करता है! कल का आनंद बड़ा होगा। आने वाला समय बहुत बड़ा खुशियों का संसार लेकर आएगा। बचपन! माता-पिता के डांट में गुजरता है। किशोरावस्था! आनंद की कल्पनाओं में गुजर जाता है। युवावस्था! जिम्मेवारी और पत्नी-पति के आपसी नोकझोंक में गुजर जाता है।
लाचार बुढ़ापा! वास्तविक आनंद नहीं मिला! इस अफसोस की कल्पनाओं में गुजरता है। जीव जब अपने भावनाओं में जीने लगता है, रोज! आनंद की तलाश में भटकने लगता है। पूरा जीवन गुजर जाता है परंतु अंततः आनंद हाथ नहीं आता। एक समय ऐसा आता है! जब कल्पना भी साथ देना बंद कर देता है।
यह जीवन की सच्चाई है।उसके बाद भी दुहाई है, इंसान की! जो कहता है आनंद तो सिर्फ इंसानों के लिए है। यदि वास्तव में यह संसार सिर्फ इंसानों के लिए बना होता! इंसान के हाथ में इस प्रकृति को संचालित करने का शक्ति होता। इंसान जैसे अपने आप को बहलाने की कोशिश करता है, वैसे हीं दूसरे को खुश करने की कोशिश करता है,अपने शब्दों के जरिए!
क्या बंदर खेल नहीं खेलते। यदि बंदर खेल खेलते हैं, तो निश्चित तौर पर बंदर हंसते भी होंगे!गाते भी होंगे! और बंदर नाचते तो हैं, यह सब जानते हैं।
अपने साथ रह रहे कुत्ते को लोग सब जानते हैं।क्या वह खेल नहीं खेलता क्या? उसे खेल खेलकर आनंद नहीं आता क्या? उसके जीवन में भी हंसी और खुशी तथा गम! कम नहीं है।
वास्तव में आनंद किसी के जेब का संपत्ति नहीं है। वास्तव में आनंद तो कल्पनाओं के अंदर बैठा हुआ राजा है।जो हंसता भी है! मुस्कुराता भी है! परंतु किसी के हाथ नहीं आता।इसीलिए हमारे महामानवों ने आनंद के बजाय परमानंद का ध्यान किया। ईश्वर से जब साक्षात्कार हो जाता है तो व्यक्ति क्षणिक आनंद के बजाएं परमानंद से अपना रिश्ता जोड़ लेता है। जब जीवन में परमानन्द आ जाता है!उसके बाद जीने में भी आनंद और मरने में भी आनंद! वही व्यक्ति ईश्वर से कहता है! हे ईश्वर! तू एकबार नहीं! हजार जन्म दें ! मैं फिर जीवन जीऊंगा!
विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण
हम इंसानों में विपरीत लिंग के प्रति एक अलग मानसिक प्रभाव देखने को मिलता है। यह ऐसा नहीं है! यह गुण सिर्फ हम इंसानों में हैं। जैसा हमने ऊपर कहा,जो जैसा है उसे वैसा ज्यादा पसंद आता है। विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण अथवा मस्तिष्क का कंपन एक प्राकृतिक गुण है।
प्रत्येक व्यक्ति यदि चिंतन करें!अपने भावनाओं में समझ सकता है। यदि युवावस्था में कोई सामान उम्र का समलिंगी हो, तो ऐसी स्थिति में मस्तिष्क में किसी प्रकार का कोई कंपन नहीं होता। यहां इस बात का चिंतन क्यों? यहां पर यह बहुत गंभीर विषय है, आगे जो समझना है उसके लिए यह चिंतन! आवश्यक था।
यह बात है!दूसरे जीवो के अंदर क्या हम मानव के जैसा आनंद नहीं है? हमारा शास्त्र जिस चौरासी लाख योनियों की बात करता है। मेरे मुताबिक कोई ऐसा नहीं है जो हम मानव के जैसा बिना प्राकृतिक गुणों के हो अथवा वह भोग और इच्छा से दूर हो।
किसी जीव का यदि उम्र! मात्र एक घंटा भी है, तो उस एक घंटे में अपने पूरे उम्र को वह जी लेता है। हम मानव के सौ सालों के बराबर एक घंटे संपूर्ण जीवन को जी लेता है। किसी जीव का उम्र यदि चार दिन की हो तो उतने हीं समय के अंदर एक लंबे जीवन को जीता है।
इस प्रकृति में! ईश्वर ने प्रत्येक पेड़ पौधे से लेकर एक-एक जीव तक को खास बना कर भेजा है। इंसान बुद्धि के हैसियत से प्रकृति के समस्त जीवों से अपने आप को उत्तम मानता। जब हम इंसान दूसरे जीवों का भाषा तक नहीं समझते! फिर हमारे लिए उनके दिल में क्या है वह किसे पता? एक पुरानी कहावत है “अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना।” अपनी सोच से सब अच्छे हैं।
सामाजिक अच्छा तो तब साबित होता है,जब कोई व्यक्ति! समाज के अंदर कोई विशेष उदाहरण देकर अपने उत्तमता को साबित करता है। वास्तव में उस ईश्वर! का कोई खास नहीं है और किसी का वह ईश्वर! भी खास नहीं है।
ईश्वर अपनी प्रकृति के द्वारा समस्त संसार का संचालन करता है। इस प्रकृति का नियम है, कि उसके लिए सब समान है। इसका छोटा उदाहरण है,जब प्राकृतिक आपदा आता है तो ईश्वर विरोधियों के साथ-साथ ईश्वर प्रेमी भी उसका शिकार होते हैं। प्रकृति के सभीं जीवों में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण समान होता है। इस धरती का समस्त जीव समान है और सब को जीवन को जीने का अधिकार है। जो भक्ति करता है उसे भगवान चाहिए।जो मंदिर में पूजा और आस्था रखता है उसे मंदिर चाहिए।
भगवान की चाहत
जब इंसानों का बौद्धिक स्तर ऊंचा होता है, तब वह समझने लगता है कि वह ईश्वर महत्वपूर्ण क्यों है? जितने भी अनुभवी महामानव हुए उन्होंने अपने शब्दों के जरिए यह दर्शाया की ईश्वर महत्वपूर्ण क्यों है? उन महात्माओं ने स्पष्ट रूप से व्यक्त किया आखिर भगवान क्यों चाहिए?
आज के समाज में सबको पता जीवित अवस्था में है सब अपनें साथ छोड़ देते हैं। एक वृद्ध व्यक्ति के साथ कोई भी समय व्यक्त करना नहीं चाहता। नाती-पोते को वह आनंद नहीं आता जो खेल में आता है। बेटे-बहू को अपने जीवन से फुर्सत नहीं होता। दोष इसमें किसी का नहीं! दोष!जीवन की लड़ाई का है।
जीवन की लड़ाई को लड़ने के लिए कौन कितना मजबूत है,यह उसका आत्मबल बताता है। जब सब अपने साथ छोड़ जाते हैं, जब सब सपने साथ छोड़ जाते हैं। जब जीवन की आशा उम्मीद! सब खत्म हो जाते हैं। उसके बाद उस ईश्वर का नाम और उस ईश्वर का चिंतन हीं साथ रहता है।
यदि किसी भक्त ने उस ईश्वर को किसी नाम और रूप से बांध रखा है, तो उस समय वह ईश्वर उस रूप और नाम से मौजूद रहता है। सनातन साहित्य कहता है! नाशवान से दिल ना लगाओ। जिसका नाश हो जाने वाला है, यह पता भी है! उसके बाद भी दिल लगाओगे तो क्या होगा? जिसका स्वयं का अस्तित्व निश्चित नहीं है वह तुम्हें निरंतर आनंद के लम्हों में कैसे बांध सकता।
कोई सत्य! कहता है, कोई समय! कहता है, कोई तत्व! कहता है, कोई शक्ति! कहता है, कोई भगवान! कहता है, कोई ईश्वर! कहता है। परम भक्त उस ईश्वर को,अनेंक नामों से कहता है।
वह ईश्वर है! यह आज तक कहते हुए सिर्फ सुना गया है। देखते हुए कभी कहा नहीं गया। यह वास्तविक सत्य है।
वह भगवान!ईश्वर! कहने और कल्पना करने वाले के लिए समान रूप से उपस्थित है। जब उस ईश्वर को वास्तविक रूप से किसी ने देखा हीं नहीं तो उसे बांधने की कल्पना कौन करें?
वह ईश्वर भक्तों के लिए चिंतन और रूप दिए जाने पर आसानी से उपलब्ध है। भक्त का अपनी मनमर्जी है। वह भक्त ईश्वर को किस रूप में देखना चाहता है। ईश्वर भक्तों का अपना मनमर्जी है। वह उसको कौन से नाम से पुकारता है अथवा पुकारेगा।
जिसे ईश्वर चाहिए वह ईश्वर का भक्त है। इस संसार में जिसे जो चाहिए वह उसी का भक्त है। ईश्वर का अनन्य भक्त बखूबी जानता है,ईश्वर क्यों चाहिए? जिसे ईश्वर नहीं चाहिए उसे कौन कहता है, ईश्वर ले लो। और किसकी मुट्ठी में है जो कोई दे सकता है।
मंदिर की चाहत
आप चिंतन करेंगे , मंदिर क्यों चाहिए? इस बात को कहने के लिए इतने लंबे लेख की क्या आवश्यकता था? महानुभाव! जिसे पता है मंदिर क्यों चाहिए वे तो इस बात को भलीभांति समझते हैं।जो नहीं समझते वे क्या जाने आखिर मंदिर क्यों चाहिए?
मंदिर क्यों चाहिए यह तो मंदिर के भक्तों के ऊपर छोड़ देना चाहिए। जो ईश्वर के स्वरूप को नहीं मानते, वे मंदिर में भगवान को क्या मानेंगे।
भक्त को भगवान चाहिए! उससे दूसरे को क्या? जो मंदिर के पूजक है! मंदिर उनको चाहिए दूसरे को क्या? सनातन संस्कृति में वेदोक्त रीति से ईश्वर के स्वरूप का प्राण प्रतिष्ठा होता है। हमारे पूर्वज संत महात्माओं ने अपने जीवन के शोध के प्रमाण के रूप में एक ईश्वर भक्ति का आधार प्रस्तुत किया।
श्री राम जो अपने चरित्र से इतना महान हुए की उतना महान ईश्वर के सिवा और कोई हो नहीं सकता। उस राम को इस रूप में प्रतिष्ठित कर दिया गया ।जो चाहे उस ईश्वर के निकट आकर अपनी व्यथा को व्यक्त कर सकता है। जिसे लगे कि उसे बाहरी शक्तियों की आवश्यकता है वह मंदिर में आए और अपनी भावना के अनुसार शक्ति का अर्जन करे।
हमारे सनातन संस्कृति में यही होता है। यदि मंदिर में ईश्वर भक्तों का! कल्याण नहीं होता, अथवा ईश्वर से कुछ प्राप्ति नहीं होता! तो कोई भी मंदिर में अपने स्वेच्छा से नहीं जाता। जो सनातन संस्कृति के ऊपर आक्षेप करने वाले व्यक्ति हैं! वह वास्तव में सनातन संस्कृति को समझते ही नहीं।
किसी धर्म में तो किसी क्रिया के जरिए उस धर्म का बनाया जाता है। सनातन धर्म में ऐसा नहीं है। सनातन का सिद्धांत है जो कोई भी मनुष्य इस धरती पर जन्म लेता है सब सनातन में हीं जन्म लेता है।
अर्थात संसार का प्रत्येक मनुष्य जन्म से सनातन धर्म का हीं है। अपने संस्कृति में किसी को जबरदस्ती अपने धर्म का नहीं बनाया जाता। सनातन पद्धति तो स्वेच्छा से निर्माण हुआ पद्धति है। सनातन पद्धति अपने आप निर्मित हुआ प्राकृतिक पद्धति है।
जब माता-पिता अपने शिशु का नामकरण तथा पहचान बनाने के लिए स्वतंत्र है! तो फिर मंदिर का महत्व मंदिर के अनुयायियों पर छोड़ना चाहिए। ईश्वर का नाम और ईश्वर का स्वरूप भक्तों के ऊपर छोड़ना चाहिए। ईश्वर भक्त स्वयं यह फैसला करेंगे कि उनकें ईश्वर का नाम क्या होगा और ईश्वर का स्वरूप क्या होगा। ईश्वर के भक्त स्वयं विचार करें कि वह भगवान क्यों चाहिए, ईश्वर क्यों चाहिए? तथा इस समाज में आखिर मंदिर क्यों चाहिए?
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