उलटा नाम जपत जग जाना,
बालमीकि भये ब्रह्म समाना।।
श्री गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में कहते हैं।”यह संपूर्ण जगत को पता है, उल्टा नाम जप कर भी वाल्मीकि जी ब्रह्म के समान हो गए।”
वेदांत कहता है परम शक्ति ब्रह्म को किसी ने नहीं देखा। जिसने देखा वह शब्दों के जरिए व्यक्त नहीं कर सकता। वेदांत यहां तक कहता है जिस किसी ने कहा कि उसने उस शक्ति को देखा है। इसका मतलब उसमें देख नहीं है। ईश्वर की अनुभूति लाखों प्रकार से हो सकता है और होता है।
परंतु यहां यह कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि उस ब्रह्म की शक्ति कम है। वास्तव में परम शक्ति परमेश्वर ब्रह्म की शक्ति का कोई पूर्ण रूप से कल्पना ही नहीं कर सकता। जिस किसी ने वास्तव में कल्पना की उसने कुछ न कुछ पाया।
यहां तुलसी बाबा कहते हैं राम के नाम में इतनी शक्ति है जिसे लोग उल्टा जाप कर भी स्वयं रामस्वरूप हो जाते हैं। यदि यहां राम का नाम सीधा जाप किया जाए तो राम की कृपा कितना मिलेगा। निश्चित तौर पर राम के नाम में अनंत शक्ति है।
एक भक्त के ऊपर निर्भर करता है कि वह राम नाम के सहारे उस राम से कितना शक्ति संचय कर लेता है। तुलसी बाबा यहां सीधे शब्दों में कहते हैं “वाल्मीकि जी उल्टा नाम जप कर भी ब्रह्म को पा गए । तुम सब भी सीधे राम के नाम का जाप करो निश्चित तौर पर राम को पा जाओगे।”
यहां विचारणीय बात है सृष्टि के निर्माता ईश्वर का नाम लेने में लगता क्या है। ईश्वर का नाम लेने के लिए कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता। ईश्वर के कोई विशेष नाम को ही लेना है यह भी आवश्यक नहीं है। क्योंकि यहां वेदांत कहता है ईश्वर का नामकरण भी ईश्वर में स्वयं नहीं किया। जगत निर्माता को तुम जिस रूप में भजोगे वह उसी रूप से कृपा करेगा।
किसी भक्त को यदि किसी नाम में आस्था ना हो तो भी आश्चर्य की बात नहीं है। वह चाहे तो बिना नाम वाले शक्ति का भी, चिंतन से शुरुआत कर सकता है। कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे ईश्वर पर आस्था नहीं है यह भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जिस शक्ति को वह देख और समझ नहीं पा रहा वहीं से चिंतन की शुरुआत करें।
जब इस प्रकार की चिंतन उत्पन्न हो। ऐसी स्थिति में वह स्वयं ईश्वर के खोज का शोधक बने। यदि नहीं कर पा रहा तो वह शोध करने की कोशिश करें। जगत के निर्माता का चिंतन भी ईश्वर के नाम के सदृश्य फल देगा। ईश्वर का चिंतन तो स्वयं करना होगा।
ईश्वर के बारे में कोई भी बता सकता है परंतु समझा नहीं सकता। ईश्वर को समझना तो स्वयं होगा। इसके लिए एक मात्र रास्ता है ईश्वर का चिंतन! ईश्वर के नाम का जाप। इसलिए तुलसी बाबा कहते हैं कि ईश्वर के नाम में अनंत शक्ति है। आज यदि चिंतन विचार करें तो पता चलता है।वाल्मीकि जी जैसे अनेंक भक्त ईश्वर के नाम का, ईश्वर के भक्ति का सहारा लेकर स्वयं ईश्वर स्वरूप हो गए। आज वे भी ईश्वर के सदृश्य जगत में ईश्वर सम्मान पाते हैं।
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