“कभी भी ईश्वर इंसान को कमजोरी देकर पैदा नहीं करता। प्रकृति में इंसान अपनी कमजोरियां स्वयं पैदा करता है।“
किसी भी स्थिति में ईश्वर को दोष दे देते हैं लोग। ईश्वर को दोष देना बहुत आसान है। जबकि हमारे पूर्वजों ने अपना विचार प्रकट किया है कि ईश्वर किसी के सुख-दुखों में सम्मिलित नहीं होता। परम शक्ति ईश्वर ने प्रकृति का निर्माण तो कर दिया परंतु उसके बाद वह प्रकृति के नियमों में हस्तक्षेप नहीं करता।
इंसान स्वयं अपनी इच्छा को बढ़ावा देता है। इंसान स्वयं नाना प्रकार के सपनों को सच करने की कोशिश करता है। वह जो कुछ भी देखता है वह सब हासिल करना चाहता है। वह अपने सामर्थ्य और योग्यता पर कभी विचार नहीं करता। आप यह भी कर सकते हैं कि कोई भी अपने ऊपर दोष नहीं लेता।
समाज का दस्तूर है यदि कुछ मिल गया तो उसके परिश्रम से मिला और यह दिन नहीं मिला तो भगवान ने बीच में भांजी मार दी। इसी चीज को सिद्ध महापुरूष अपने तरीके से कहते हैं। वह कहते हैं जितना गलत हुआ वह मैंने किया है और जो अच्छा हुआ है वह सब ईश्वर ने किया है।
यदि किसी को सुख में दुःख खोजना है तो उसके लिए भी वह तलाश सकता है और दुःखी भी हो सकता है। ऐसे ही अगर किसी को दुःख में सुख खोजना है तो वहां उसके ऊपर निर्भर करता है कि वह कैसे सुखी हो जाएगा।
अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम,
दास मलूका कह गए सब के दाता राम।।
यहां आप देखो अजगर किसी की नौकरी नहीं करता। ना हीं पंछी कोई काम करता है। सबको देने वाला ईश्वर है यह बात श्री मान मलुक दास जी बोल गए। ऐसे में देखो यदि भगवान आने जाने वाले होते हैं और दिखने वाले होते तो ऐसे में सभी इंसान मिलकर धरने पर बैठ जाते। परंतु इंसानों को पता है ईश्वर के सामने उसकी एक नहीं चलती है।
ईश्वर सभी जीवों को उनके अनुसार से शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करता है। सभीं अपनी पूर्ण शक्तियों का इस्तेमाल भी करते हैं। सारे जीवन में इंसान कुछ ज्यादा होशियार है। बाघ-शेर का पेट भरा रहता है तो वह किसी जीव पर हमला नहीं करता। परंतु इंसान जरूरत ना हो तो भी इकट्ठा करने के लिए सब कुछ कर गुजरने पर तैयार हो जाता है।
कोई कहता है बेवजह बारिश हो रही है। कोई कहता है बेवजह गर्मी पर रही है। कोई कहता है बेवजह ठंड पड़ रहा है। यह सब प्राकृतिक स्थितियां आपके अथवा किसी के कहने के अनुसार से नहीं चलता है। धरती के संपूर्ण जीवों को इसी प्रकृतिक स्थितियों ने पैदा किया है। यही परिस्थितियों बनकर अनेंकों और करोड़ों जीवन का और निर्माण करती है।
आपके सुविधा के अनुसार से ना बारिश होगा ना आपके सुविधा के अनुसार से गर्मी पड़ेगी। प्रकृति को कोई संतुलित नहीं कर सकता प्रकृति अपना संतुलन स्वयं करती है। इस बीच में ईश्वर को लाने की आवश्यकता क्या है? ईश्वर ने तो अपनी सिस्टम के अनुसार से जन्म दे दिया। बुद्धि दे दिया, हाथ पैर दे दिए और सब कुछ दे दिए। अब जिओ खाओ या मरो तुम्हारी इच्छा है।
प्रकृति में अमृत के समान फल भी मिलता है और जहर के सामान भी फल मिलता है। जीव को क्या खाना है यह जीव के ऊपर निर्भर करता है। ईश्वर ने धरती पर इंसान बने हैं जन्म मृत्यु की एक प्रक्रिया सेट की है। उसने इंसान के अंदर कोई कमजोरी पैदा नहीं करी। इंसान स्वयं भावनाओं के अधीन होकर इच्छा के अनुरूप अपनी कमजोरी का निर्माण करता है। यही कमजोरी उसके जीवन में दुःख का सबसे बड़ा कारण बनता है। ईश्वर को दोष देना बंद करके संभव हो तो अपनी कमजोरी को ढूंढ कर मार डालो। इसके बाद ईश्वर से ना गिला होगा, ना शिकवा होगा, ना ही शिकायत होगा।
हर आदमी अपने सामर्थ्य के अनुसार से लक्ष्य का निर्धारण करता है। परंतु उसकी कमजोरी उसके बीच में अवरोध का काम करती है। यदि वह इन कमजोरीयों से अपने आप को मुक्त कर लेता है तो निश्चित तौर पर वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो सकता है। ऐसे में इंसान को सोचना है या तो उसे कमजोरी चाहिए या लक्ष्य।