देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत |
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || २/३० ||
भगवान ने कितने सरल भाषा में अपने शब्दों को कहा है। वे अर्जुन से कहते हैं- “हे भारतवंशी! शरीर में रहने वाले (देही) का कभी भी वध नहीं किया जा सकता । अतः तुम्हें किसी भी जीव के लिए शोक करने की आवश्यकता नहीं है ।”
आज के समय कोई अज्ञानी नहीं है। कहां जाए कि शास्त्रों का ज्ञान लोगों के अंदर कूट-कूट के भरा हुआ है तो यह आश्चर्य की बात नहीं होगा। ऐसा लगता है जैसे भक्त का कान सुन-सुन कर बहड़ा हो गया है। वह और सुना नहीं चाहता। जैसे और नहीं! वह सुनकर मस्तिष्क को बताना नहीं चाहता है।
प्राचीन काल में लोगों के पास ज्ञान नहीं था। आज सभी ज्ञानवान है। यदि आज के समय ज्ञान को देखना तो किसी मोक्ष स्थान पर पहुंच जाओ। अंतिम संस्कार किया जा रहा हो। वहां ध्यान से कान लगाकर सुनो सब आपस में कितने उत्तम विचार पर चिंतन और मनन करते हैं। ऐसा लगता है वहां पर सभी आत्मज्ञानी हो।
परंतु आश्चर्य ! जैसे ही मोक्ष स्थान से बाहर निकलते हैं सांसारिकता उन्हें वापस जकर लेता है। व्यक्ति पूरे उम्र उस जकरण से निकलने के लिए छटपटाते रहता है। वह मार्ग भी जानता है निकलने के लिए परंतु उस मार्ग को अपने ऊपर लागू नहीं कर सकता। स्वयं ज्ञानी रहते हुए अज्ञानता की चादर ओढ़े सोए पड़ा रहता है।
कोई उसे जगाने की कोशिश करता है फिर भी वह जागने को तैयार नहीं। वह दर्द से बेचैन में है , उसका मस्तिष्क बोलता है यह बात ठीक नहीं। परंतु उसका मन बोलता है नहीं मैं यही ठीक हूं। मुझे इस अज्ञानता की चादर में सोया पड़ा रहने दो।
भगवान यहां कहते हैं किसी जीव के लिए शोक करने की आवश्यकता नहीं है। यह तो स्पष्ट कहते हैं यह सब मरे हुए हैं। तू इन सबको मार कर अपने आप को वीर भी मत समझना। तू उनके साथ प्रेम भी मत कर। क्योंकि तू अपना जानकर इन्हें प्रेम करेगा तो फंस जाएगा। तू सिर्फ कर्म कर। तेरा कर्म करने में ही अधिकार है।
एक बार ज्ञान फिर कहता है “भक्त तू सिर्फ कर्म कर। तेरा कर्म करने में ही अधिकार है। इसके सिवा तेरे पास कोई रास्ता भी नहीं है। और जब तेरे पास कोई रास्ता नहीं है तो इस पद्धति को मानने में हर्ज किया है। तू फल की चिंता ना कर। फल को तू नहीं जानता समय जानता है तू क्या पाने वाला है। तू कर्म कर और जितना बढ़िया से हो सकता है उतना बढ़िया से कर। तेरा कर्म जितना अच्छा होगा उसका फल भी उतना ही अच्छा होगा यह तू स्पष्ट ध्यान रख।
तू व्यर्थ की भाव में इधर-उधर उलझ मत। तू अपना सारा ज्ञान कर्म को अच्छे से करने में लगा। तू सत्य के साथ है। तू सत्य को साथ लेकर जो कुछ भी करेगा उसमें जीत निश्चित है। क्योंकि सत्य तो सदैव सत्य ही रहता है। झूठ बनता है अथवा बनाया जाता है। सत्य अपने ज़मीन पर टिका हुआ रहता है। परंतु असत्य का अपना कोई ज़मीन नहीं होता।
कोई शरीर को मार सकता है परंतु आत्मा को कोई करने में सक्षम नहीं है। इसलिए तू व्यर्थ के उलझन में ना पर। तू युद्ध कर! जीवन के संघर्ष को जीतने की कोशिश कर। निश्चित तौर पर तू इसमें विजय होगा। तू कर्म करेगा तो निश्चित तौर पर तुझे फल भी प्राप्त होगा। यह कर्म का नियम है, यही प्रकृति का नियम है।