मन का माला फेर

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥

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श्री कबीर जी महाराज यहां कितनी सुंदर विचार प्रकट करते हैं। वे कहते हैं – “देखो माला फेरते हुए बरसों हो गए । परंतु अफसोस फिर भी मन का विचार नहीं बदला। हाथ का माल छोड़ दो , सिर्फ मन से मन का माला फेर।”

प्रायः यह देखने में आया है हाथ में माला चल रहा होता है। जिव्हा एक मंत्र भी जप रहा होता है। परंतु मस्तिष्क कहीं और लगा होता है। अर्थात एक तरीके से हाथ और जिव्हा नौकरी पर लगे हुए होते हैं और मन अपना काम करता है।

जबकि ईश्वर भक्ति में होने वाले सभी क्रिया ईश्वर के प्रति एकाग्रता के लिए सहायक के तौर पर उपयोग किए जाते हैं। वास्तव में ईश्वर भक्ति के लिए स्वरूप से किसी क्रिया की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि परम शक्ति ईश्वर भी स्वरूप से दृष्टि में नहीं आते।

भक्ति सिद्धांत तो कहता है “ऐ बालक तू तन को संसार के लिए और समाज के लिए करने दे। मन को तू सदा-सदा के लिए अपने ईश्वर के पीछे लगा दे।” जबकि विचारगत अवलोकन करें तो पता चलेगा यह संपूर्ण संसार ईश्वर भक्ति में मन को संसार में लगाए रखता है और तन के द्वारा सिर्फ क्रिया करता है।

इसलिए यहां कबीर जी महाराज स्पष्ट कहते हैं । “तेरा माल फेरते हुए , अर्थात भक्ति के लिए कर्म करते हुए अनेक वर्ष बीत गए। फिर भी तेरे मन के अंदर कोई बदलाव नहीं हुआ। अब तू एक काम कर हाथ वाला माल रख दे। तू जो ईश्वर भक्ति पाने के लिए क्रियाएं कर रहा हैं उन सभी क्रियाओं को बंद कर दे। उसके बाद ईश्वर भक्ति पाने के लिए सिर्फ मन से माला जाप कर अर्थात मन से हीं क्रिया किया कर। “

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