माया और मन की माया

माया मुई न मन मुवा,
मरि-मरि गया सरीर।

कबीर जी महाराज अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं – मनुष्य का न तो मन मरता है और न ही उसकी इच्छाएँ समाप्त होती हैं। केवल उसका शरीर नश्वर है और वही मरता है।

जीव जब तक मन और माया के मोह में फंसा रहता है, तब तक वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता और अनेक योनियों में भटकता रहता है।

माया और मन की माया vichartantra

कबीर जी का यह विचार आत्मज्ञान और वैराग्य की प्रेरणा देता है। वे हमें चेताते हैं कि जब तक हम मन की चंचलता और माया के आकर्षण से मुक्त नहीं होंगे, तब तक आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।

अतः उन्होंने सत्य, भक्ति और साधना को जीवन का मूल मार्ग बताया है जिससे मोक्ष की प्राप्ति संभव है। शरीर नश्वर है, परंतु आत्मा अमर है। मन और माया के बंधनों से मुक्त होकर ही आत्मा को परम शांति मिल सकती है।

अतः आध्यात्मिक विचार के अनुसार अपने जीवन के समय हीं इच्छा और मन के ऊपर विजय प्राप्त कर लिया जाए। क्योंकि इच्छा अथवा मन ही ऐसा तत्व है जिसके चक्कर में मनुष्य जीवन पर्यंत तक अपने आप को अधूरा मानता है। जब तक इच्छाओं पर विजय प्राप्त न किया जाए तब तक जीवन में शांति प्राप्त नहीं हो सकता।

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