निष्काम कर्म के आरम्भ का नाश भी नहीं होता और उल्टा फल भी नहीं होता। थोडा-सा भी निष्काम कर्म महान भय से तार देता है। अन्त काल का थोडा भी भजन-ध्यान तार देता है। अंतकाल का थोडा भी निष्काम भाव भी वृद्धि को प्राप्त होकर कल्याण करता है।
स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज
इंसान पूरे उम्र अच्छे और बुरे कर्मों के तौल में बेचैन रहता है। क्या करूंगा तो क्या फल प्राप्त होगा? क्या करूंगा कि कितना अधिक फल प्राप्त होगा ? मैं क्या करूंगा कि मुझे सद्गति मिलेगी? मैं कौन सा कर्म करूं कि कल्याण को प्राप्त होऊ? ऐसे ना जाने अनगिनत प्रश्न व्यक्ति के अंदर उठते रहता है। कितने ऐसे उसने कर्म किए हैं जिसे वह स्वयं मानता होगा कि उसे वैसा कम नहीं करना चाहिए।
श्रीमद् भागवत गीता में भी आया है कि कर्म की गति बहुत गहन है। कर्म क्या एवं अकर्म क्या इसकी चयन कोई कैसे करें। स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज इन सब प्रश्नों के बहुत सरल तरीके से उत्तर देते रहें। उस जगह पर वे सरल भाषा में कहते “बस तुम परमेश्वर के लिए कम करो बाकी चिंता छोड़ दो। जब तुम ईश्वर के लिए काम करना शुरू कर दोगे तो फिर तुमसे गलत कुछ होगा ही नहीं। यदि तुम परमेश्वर के भक्त बनकर उसी के लिए कर्म करना करोगे तो वह परमेश्वर तुमसे गलत कर्म होने भी नहीं देगा।”
श्रीमद् भागवत गीता भी यही कहता है स्वार्थ व्यक्ति को अंधा बना देता है। इसी अंधेपन में व्यक्ति को करना कुछ चाहिए और कर कुछ जाता है। इसीलिए जीवन में सदैव कर्म योग के आचरण की बात कहा गया है। कर्म योग अर्थात जीवन के सभीं कर्म परमेश्वर के लिए और परमेश्वर के इच्छा के अनुरूप करना। स्वामी जी यहां निष्काम कर्म की बात करते हैं। निष्काम कर्म को समझने के लिए पहले सकाम कम को समझाना पड़ेगा।
सकाम कर्म का अर्थ यह हुआ कि अपने उद्देश्य के लिए कर्मकरना। अथवा इस और सरल भाषा में कहें तो वे यहां कहना चाहते हैं फल की इच्छा को त्याग कर कर्म करना। क्योंकि फल की दृष्टि से किया गया कर्म अच्छा और बुरा दोनों प्रकार का फल देता है। यहां स्वामी जी कहते हैं निष्काम कर्म आरंभ से फल रहित होता है। क्योंकि ऐसे कर्म के पीछे साधक का भावना लिप्त नहीं होता।
स्वामी जी निष्काम कर्म को बहुत उच्च दृष्टि से बताते हैं। वे कहते हैं थोड़ा सा भी किया गया निष्काम कर्म जीवन के भय को दूर कर देता है। निष्काम कर्म करने वाला व्यक्ति निर्भय हो जाता है। अच्छा सकाम दृष्टि से कर्म करते है उसे पाप और पुण्य दोनों फल प्राप्त होते हैं। चुकी निष्काम कर्म का कोई फल प्राप्त नहीं होता है इसलिए निष्काम कर्म करने वाला साधक निर्भय होकर जीवन पर्यंत शांत जीवित रहता है। अंत काल में निर्भय होकर शरीर का त्याग करता है। उसके रास्ते में किसी प्रकार का पाप और पुण्य नहीं आता है।
साथ स्वामी जी कहते हैं की निष्काम भजन भी अत्यंत आवश्यक है। सकाम भजन का फल प्राप्त होता है। जिसकी जैसी इच्छा है और उसके अनुरूप भजन करता है, वैसा उसको फल प्राप्त होता है। परंतु जो निष्काम भजन करता है वह साधक अंत में अत्यंत वृद्धि को प्राप्त होता है। निष्काम कर्म शब्द श्रीमद् भागवत गीता से है और श्रीमद् भागवत गीता योग की शिक्षा देती हैं। निष्काम कर्म भी एक प्रकार से योग साधना है।
जिस दिन से जो व्यक्ति निष्काम कर्म करता है उस दिन से उसका पूरा प्रकृति में अपने लिए और प्रकृति के लिए दृष्टि बदल जाता है।
निष्काम कर्म जब से शुरू होगा तब से व्यक्ति इच्छित मोह माया को छोड़कर निर्णय करेगा। अर्थात एक प्रकार से वह जो कुछ भी क्रिया करेगा अथवा कर्म करेगा उस कर्म में उसकी इच्छित भावना लिप्त नहीं होगी। निष्काम कर्म करते हुए वह शुद्ध रूप से सिर्फ कर्म करेगा। वह करने योग्य कर्म करेगा। वह सिर्फ और सिर्फ शुद्ध रूप से कर्म योग का आचरण करेगा। वह इस प्रकार कर्म करते हुए उसके फल से ना खुशी होगा ना दुःखी होगा। निष्काम कर्म करने वाले योगी को कर्म फल छू भी नहीं सकता।
स्वामी जी कहते हैं यह मत सोचो की उम्र कितनी है। अंत काल का थोड़ा सा भी निष्काम कर्म भाव वृद्धि को प्राप्त कराता है और कल्याण करता है। स्वामी जी कहते हैं कि यह मत सोचो हो नहीं रहा है। उन्होंने बार-बार कहा आज से अभी से यह मान लो हम ईश्वर के हैं और एक ईश्वर हीं हमारा है। फल की दृष्टि से कर्म करोगे तो फल मिल जाएगा उसके बाद किए कर्म को याद क्यों करना।
यहां कर्म की दृष्टि आई है तो फिर याद आता है। तीन प्रकार के कर्मों से जब व्यक्ति ऊपर उठता है तब जाकर निष्काम कर्म होता है। तामसी कर्म ,राजसी कर्म और सात्विक कर्म। जो इन कर्म के फल की व्याख्या जानते हैं वे समझ सकते हैं। जो जैसा कर्म करेगा उसे वैसा फल भी प्राप्त होगा। इसलिए इससे ऊपर जो निष्काम कर्म करता है उसे उसका फल नहीं मिलता। इस स्थिति में वह पूर्ण रूप से ईश्वर में स्थित होकर कर्म करने की कोशिश करता है।
ऐसे साधक एक बार आगे बढ़ाने के बाद पीछे नहीं बढ़ता। श्रीमद् भागवत गीता जी कहते हैं ऐसा साधक , अपने कर्म के प्रयास से, उत्तम जन्म की गति से और फिर सीधे परम गति को प्राप्त करता है। इसलिए सदैव निष्काम कर्म योग करने की प्रयास करनी चाहिए। यदि सुख की तलाश में कर्म करोगे तो उसके पीछे दुःख अपने आप आएगा। साधक को सदैव निष्काम कर्म करते हुए अपने आप को एक रस में रहने की आदत डालनी चाहिए। क्योंकि निष्काम कर्म का फल अनंत गुना फलदाई होता है।
Dear Ved
Your posts have always been the greatest delight to read.
Thanks for liking my post, Radio2 🙏❤️
Your posts are also very inspiring. Thank you so much for your kind words and comments! 🙏
Dear Ved
It’s a fresh evening reading your post.
Thanks for liking my post, ‘Translation’ :
Prof Dr Raj alias ‘Veerites’
🙏❤️
Thank you so much for your warm message.
It’s always a pleasure to engage with your thoughtful posts.
Wishing you continued inspiration and success in your work.
Warm regards,
R Vedansh 🙏
Thanks, Ved 🌹