पहचान अपना कौन

कहने को तो इस संसार में सभी अपने होते हैं, कोई पराया नहीं लगता। परंतु जब जीवन में मुसीबत या लाचारी का समय आता है, तब वास्तविकता का अनुभव होता है और हमें सच्चे अपनों की पहचान मिलती है। सुख के समय जो साथ दिखाई देते हैं, वे दुःख के क्षणों में प्रायः दूर हो जाते हैं। यही समय हमें बताता है कि कौन वास्तव में हमारा अपना है और कौन केवल स्वार्थवश साथ था।

Pahchan apna Kaun

जब शरीर अस्वस्थ होता है, तब हमारा मन भी कमजोर पड़ जाता है। शरीर और मन दोनों ही एक-दूसरे पर निर्भर हैं। लेकिन जैसे-जैसे वृद्धावस्था आती है, वैसे-वैसे वह दुनिया भी पराई लगने लगती है, जिसे हमने अपने परिश्रम और प्रेम से बनाया था। परिवार, धन, प्रतिष्ठा — सब कुछ धीरे-धीरे हमसे दूर होता जाता है।

जिस शरीर पर कभी हमें गर्व था, वही शरीर एक दिन धोखा दे देता है। शक्ति क्षीण होने लगती है, इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं, और मनुष्य अपने ही अस्तित्व पर प्रश्न करने लगता है। उसी समय लाचारी मानो मुँह चिढ़ाकर कहती है —

“बेटा, तूने तो सारा जीवन तन से, धन से, और ऐश्वर्य से प्रेम किया,
परंतु तूने सच्चा प्रेम अपने शक्ति-दाता ईश्वर से नहीं किया।”



यही कारण है कि महात्मा लोग बार-बार कहते हैं —

“पहचान, अपना कौन?”



जीवन का सच्चा साथी न धन है, न शरीर, न संसार — सच्चा साथी केवल परमात्मा है। जब मनुष्य इस सत्य को समझ लेता है, तभी वह सच्चे अर्थों में मुक्त होता है।


निष्कर्ष अमृत

संसार में सब कुछ अस्थायी है। अपनों की पहचान संकट में ही होती है, और जीवन की सबसे बड़ी पहचान तब होती है जब हम यह समझ जाते हैं कि सच्चा “अपना” केवल ईश्वर है, जो हर स्थिति में हमारे साथ रहता है। इसलिए जीवन में भौतिक वस्तुओं या संबंधों में नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रेम और भक्ति में मन लगाना ही सच्ची बुद्धिमानी है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *