प्राकृतिक सिद्धांत का मूल – गीता

श्रीमद्भागवत गीता एक ऐसा ग्रंथ है, कि शायद ही कोई ऐसा हो जो इनके बारे में ना जानता हो। सनातन पद्धति के लिए अनेकों वेद पुराण ग्रंथ मौजूद है। सभी अपने आप में परिपूर्ण है, वास्तव में किसी से किसी की तुलना नहीं हो सकता, परंतु गीता जी के लिए कहा गया है की गीत सबसे सरल है। श्रीमद्भागवत गीता में समय काल जाति संप्रदाय किसी में भेद नहीं है। इसलिए एक दृष्टि से श्रीमद्भागवत गीता प्राकृतिक सिद्धांत का मूल है।

praakrtik siddhaant ka mool – geeta

श्रीमद्भागवत गीता में 700 श्लोक है, समाज में गीता जी के ऊपर अनेकों व्याख्यान, तथा टीका उपलब्ध है। इनसे अलग कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने अनुसार से गीता की व्याख्या करते हैं। कुछ तो ऐसे हैं कि अपने अनुसार से कुछ हीं श्लोक  का व्याख्यान करते हैं,अथवा यूं कहें कि जो श्लोक उन्हें भाता है ,उसको तो स्वीकार कर लेते हैं और बाकी को छोड़ देते हैं।

जबकि इस प्रकार से गीता जी को समझना नामुमकिन है। सभी के अपने अपने विचार हो सकते हैं, परंतु वास्तविक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यदि कोई सहमत होगा तो पूरे के पूरे 700 श्लोकों से सहमत होगा, नहीं तो उसे अधूरा माना जाएगा।

सनातन में परमेश्वर को मानना बाध्य नहीं होने के कारण, सभी के अपने-अपने परमेश्वर हैं,अथवा यूं कहें कि सभी के परमेश्वर मानने के तरीके अपने-अपने हैं, या अतीत में हुए। वेद बार-बार कहता है, परमेश्वर स्वयं की इच्छा से प्राप्त होता है।

किसी के विचार पर सहमत होना अथवा ना होना, यह कोई किसी को  बाध्य नहीं कर सकता। सभी के अपने अपने विचार हो सकते हैं, वास्तव में किसी के ऊपर अपना विचार थोपा नहीं जा सकता।

श्रीमद्भागवत गीता के लिए लोगों के पास अनेकों विचार मौजूद है, कोई कहता है श्रीमद्भागवत गीता विष्णु की वाणी है, कोई कहता है श्री कृष्ण की वाणी, कोई कहता है व्यास जी की वाणी है, तो कोई कहता है संजय की वाणी है। कोई कहता है अर्जुन को उकसाने के लिए कही गई वाणी है, कोई कहता है धर्म के लिए वाणी, कोई कहता है श्रीकृष्ण की छल की वाणी है, और अनेकों प्रकार के समाज में लोगों के पास अपनी अपनी विचार हैं, तथा अपना अपना विचार धाराएं हैं।

श्रीमद्भागवत गीता के शब्दों से पक्ष और विपक्ष, अर्थात समर्थक और विरोधी दोनों ही खेलते हैं। वास्तव में श्रीमद्भागवत गीता को अपने प्रमाण के लिए किसी व्यक्ति की आवश्यकता नहीं, श्रीमद्भागवत गीता अपने आप में परिपूर्ण हैं। विशालतम भारत में संस्कृति का आधार सनातन पद्धति रहा है। सनातन पद्धति का मूल स्रोत वेद पुराण ग्रंथ रहे हैं, और इन सभी का सारांश श्रीमद्भागवत गीता है।

श्रीमद्भागवत गीता प्राकृतिक सिद्धांत का मूल है।इस गलतफहमी में कोई ना पड़े कि श्रीमद्भागवत गीता किसी विशेष धर्म की व्याख्या करता है, किसी विशेष जाति की व्याख्या करता है। सृष्टि में जीव पहले आया, और उसका आचरण बाद में आया। आचरण ही जाति और धर्म लेकर आया। आचरण की व्याख्या जाति धर्म के आधार पर किया गया है। आज यदि कोई उत्तम आचरण वाला व्यक्ति है, तो वह निसंदेह उत्तम जाति – धर्म वाला व्यक्ति है।

आचरण का निर्माता व्यक्ति स्वयं होता है।अपने धर्म पर चलना व्यक्ति को स्वयं होता है। समाज किसी का आचरण नहीं बना सकता, समाज आचरण के आधार पर, व्यक्ति को उपनाम देता है। प्राचीन इतिहास से चल‌ रहा उपनाम हीं जाति शब्द का सूचक है। यदि आज के अनुसार से बात किया जाए, तो समाज को वर्तमान में भी आचरण के अनुसार से व्यक्ति को उपनाम दिया जाना चाहिए।

इतिहास में यह संभव था, परंतु आज यह संभव नहीं है। कारण आज कानून सबको अधिकार देता है, प्रकृति ने भी सबको सामान अधिकार दिया हुआ है। कोई यदि चोर है, तो उसे दंड दिया जा सकता है परंतु पूरे परिवार अथवा समूह को चोर कहा नहीं जा सकता। वास्तव में सभी अपने मत से महान चरित्र वाले वाले हैं। चरित्र के आधार पर कोई समाज तो विभक्त कर सकता है, परंतु व्यक्ति नहीं कर सकता।

श्रीमद्भागवत गीता व्यक्ति के चरित्र निर्माण का व्यवस्था देता है, व्यक्ति अपने आप को उत्तम चरित्र में कैसे ढाल पाए, उसका मापदंड  भारतीय संस्कृति में, सनातन साहित्य सबसे बड़ी औषधि के समान है।

4 thoughts on “प्राकृतिक सिद्धांत का मूल – गीता”

  1. आपका यह निष्कर्ष कि श्रीमद्भागवत गीता व्यक्ति के चरित्र निर्माण का व्यवस्था देती है, और यह भारतीय संस्कृति में सबसे बड़ी औषधि के समान है, मन को शांत और प्रेरित करता है।
    गीता एक शाश्वत प्रकाश है, जो युगों-युगों से हर मनुष्य को स्वयं को जानने और उत्तम कर्म करने का मार्ग दिखा रहा है।
    आपकी यह गहन और सुंदर अभिव्यक्ति वास्तव में प्रशंसनीय है।❤️

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद आपकी इतनी सराहनीय और स्नेहपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए। 🙏
      श्रीमद्भागवत गीता वास्तव में केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है, जो हर युग में मानव को दिशा और दृष्टि देती रही है।
      आपके शब्दों ने मेरे विचारों को और भी अधिक अर्थपूर्ण बना दिया।
      आपके जैसे जागरूक पाठकों से संवाद करना सदैव प्रेरणादायक होता है। 🌼
      धन्यवाद पुनः! ☀️📖

  2. The Bhagavad Gita provides the framework for the development of an individual’s character. Among Indian culture’s standards for how a person can mold themselves into excellent character, Sanatana literature is like the greatest medicine. Powerful blog Ved!
    I posted a reply in Hindi but that didn’t got uploaded or it might have went to spam hence have written again in English 😇🧡

    1. Thank you so much for your kind and insightful words! 🙏✨
      You’re absolutely right — the Bhagavad Gita truly offers timeless guidance for shaping one’s character and living with purpose. Sanatana literature, like divine medicine, continues to heal and inspire across generations. I’m grateful you took the time to rewrite your comment in English — that really means a lot! 😇🧡
      Looking forward to more of your thoughts!

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