प्रेम किसी घर में या अपनी जागीर में उपजने वाला तत्व नहीं है। यह कोई ऐसी वस्तु भी नहीं है जिसे बाज़ार में खरीदा या बेचा जा सके। प्रेम का स्वभाव स्वच्छ, स्वतंत्र और सार्वभौमिक होता है। यह न किसी सीमा में बंधता है और न किसी अधिकार से उत्पन्न होता है।
दरअसल, प्रेम का जन्म मनुष्य के अंतर्मन में होता है—उसकी संवेदनाओं, उसके व्यवहार और उसके हृदय की ममता में।

प्रेम ऐसा भाव है जिसे राजा हो या प्रजा, हर कोई समान रूप से अनुभव कर सकता है। यह किसी पद, शक्ति, धन या प्रतिष्ठा का मोहताज नहीं है। प्रेम पाने के लिए महान बने रहना आवश्यक नहीं, बल्कि मन को विनम्र बनाना आवश्यक है। जब कोई व्यक्ति अपने भीतर बसे घमंड, अहंकार और स्वार्थ को त्याग देता है, तभी वह सच्चे प्रेम को ग्रहण कर पाता है।
प्रेम का सौंदर्य इसी में है कि यह व्यक्ति को भीतर से बदल देता है। यह इंसान को सहिष्णु, दयालु और उदार बनाता है। जिस हृदय में प्रेम बस जाता है, वहां अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं रहता। राजा भी अपने वर्चस्व को भूलकर प्रेम के सामने झुक सकता है, और सामान्य प्रजा भी प्रेम के बदले स्वयं को समृद्ध महसूस करती है।
इस प्रकार, प्रेम किसी विशेष वर्ग, स्थान या परिस्थिति का बंधक नहीं है। यह तो मनुष्य की आत्मा में जन्मा वह दिव्य भाव है, जो समानता, त्याग और विनम्रता के द्वारा अपने शुद्ध रूप में प्रकट होता है। प्रेम वहीं बसता है जहां मनुष्य अपने अहं को परे रखकर, खुले हृदय से जीवन को स्वीकार करता है।