राम-रामायण और भ्रम

राम-रामायण और चरित्र यह श्रीराम से अलग नहीं हो सकता। राम के रहने का जो मुख्य स्थान है, वह रामायण है। राम अनंत है और राम का चरित्र भी अनंत है। चर्चा चिंतन के बाद अनेंक प्रकार की संका समाज के अंदर उत्पन्न होता है और व्यक्ति अपने तरीके से उन शंकाओं का समाधान निकालने की भी कोशिश करता है।

Ram-Ramayan Aur Bhram

राम-रामायण और चरित्र के ऊपर अनेक चर्चा मिलेगा, एक से बढ़कर एक चिंतक भी मौजूद हैं। गुनातीत महापुरुषों के द्वारा अनेक महा ग्रंथ मौजूद है जो राम को अनेक प्रकार से व्यक्त करते हैं। सनातन सत्य सभीं वाणियों का सम्मान करता है। यह लेख श्री राम-रामायण प्रेमि भक्तों के लिए समर्पित हैं। यह लेख हर प्रकार से भक्तों के हृदय में नया संचार प्रस्तुत करने में सहायक होगा इस उम्मीद के साथ हम सभीं का अभिनंदन के साथ नमस्कार कर शुभारंभ करते हैं।

“राम-रामायण और चरित्र”  के लिए अनेक प्रकार के अनेक प्रकार से प्रश्न उठाए जाते हैं। यह लेख में उन्हीं प्रश्नों को सामने रखकर उसके उत्तर को स्वतंत्र रूप से रखने की कोशिश है। लेख की प्रेरणा तथा विचार- “श्री एकादश सेवक महाराज” जिनका आशीर्वाद मुझे प्राप्त है , मैं अपने आप को सौभाग्यवान समझता हूं कि मुझे महान गुरु का सानिध्य प्राप्त है, और साथ में महाराज जी का। ईश्वर सदैव हीं आशीर्वाद को संजोकर रखने की शक्ति प्रदान करें।

इस लेख में कुछ नए प्रकार से चिंतन करने का आधार प्रस्तुत किया गया है,जो आशा है कि सभीं पाठकों को रुचिकर लगेगा। इस लेख में दाएं-बाएं भूत-भविष्य सब छोड़कर सीधा और सरल तरीके से चिंतन करने की कोशिश करेंगे। आशा है यह लेख ईश्वर भक्तों के लिए उत्तम मार्ग प्रशस्त करने में भागीदार होगा। भ्रम युक्त समाज के अनेंक सवाल जो एक सामान्य व्यक्ति के जीवन से जुड़ा हुआ है। जीव और वह ईश्वर कभी भी अलग नहीं है, और आगे भी कभी हो नहीं सकते।

ईश्वर का नाम
संसार में जितने भी ईश्वर का नाम लिया जाता है सभी श्री राम का नाम है। जिस भक्त को ईश्वर की जरूरत है उसे राम की जरूरत है। यह भक्तों की मर्जी है कि वह कृष्ण में सब को देखें, श्री राम में सब को देखें, भगवान शिव में सब को देखें अथवा अपने अनुसार से किसी रूप में उस ईश्वर को देखें ! यह उस भक्त की मर्जी है। परंतु भक्त को स्वयं देखना होगा,यह दूसरे के देखने से उस भक्त को कोई लाभ नहीं मिलने वाला है।

क्या कोई दूसरा ब्रह्म को प्राप्त करा सकता है, अथवा किसी और के भक्ति से ईश्वर की प्राप्ति हो सकता है?
नहीं! किसी दूसरे के मार्ग को हम आधार मान सकते हैं, परंतु दूसरे के रास्ते पर चलकर, उस ब्रह्म तक पहुंचा नहीं जा सकता। क्योंकि दूसरे के रास्ते पर चलकर अपना स्वयं का भावना सम्मिलित नहीं होता।उस ब्रह्म ईश्वर का चिंतन स्वयं का आवश्यक है। जब तक वह ईश्वर भावनाओं में स्थित नहीं होगा तब तक हम उस ईश्वर की भक्ति नहीं कर सकते। जो ईश्वर का सानिध्य पाना चाह रहा हो, उसके लिए उस ईश्वर को अपने चिंतन के जरिए रोम-रोम में बस जाने देना होगा।


उस ब्रह्म का चिंतन करने के लिए सबसे पहले उस ईश्वर का चिंतक बनना पड़ेगा। सबसे बड़ा चिंतक बनकर! चिंतन की गति इतना तीव्र हो की भावनाओं में उस राम का चिंतन के सिवा और कुछ भी न रहे। सभीं श्री राम भक्तों को सनातन सत्य का शत शत नमन। कोई शंका प्रश्न उठता हो तो उसे उठने दें, आप स्वयं से स्वयं के लिए उस ईश्वर का चिंतन करो। आपकी शंका का समाधान स्वयं आप हीं कर सकते हैं। इस लेख में आपके शंका का समाधान नहीं है। हां यह लेख आपके शंका समाधान का एक आधार बन सकता है।

आगे विचार-चिंतन विस्तार:-


राम-रामायण और चरित्र का वास्तविक समीक्षा।
राम कौन हैं?  यह बहुत बार सुन चुके!अब सिर्फ सुनना नहीं है, अब तो हमें उस राम का स्वयं से चिंतन करना है और उस राम से हीं सवाल करना है –

हे राम! तू कौन है?
संसार में ईश्वर एक हीं है। ईश्वर कभी भी अपना नाम लेकर जन्म नहीं लेता। जगत के ईश्वर को हम मानव समाज वाले उनकी महत्ता के अनुसार अनेक प्रकार से चिंतन करते हैं और जो अद्भुत आश्चर्य दिखता है,उसे हीं ईश्वर मान लेते हैं।

ईश्वर का नामकरण
परम शक्ति परमेश्वर जगत का ईश्वर हीं राम है। या इसे ऐसा कह सकते हैं,कि जो सब को शक्ति देने वाला है वही राम है। उस राम को लोगों ने अनेंक नाम दे रखा है। मेरे भगवान को दूसरे के द्वारा नाम  दिए  जाने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, और न हीं उस ईश्वर को पड़ता है। या किसी के ईश्वर को मैं किसी और नाम से पुकारूं अथवा किसी शक्ति को मैं किसी भी रूप में मानूं, उससे उसके ईश्वर को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।

समाज में जाति और संप्रदाय का नामकरण कैसे हुआ?
जिस प्रकार जाति-संप्रदाय मत! यह सभी नाम इस संसार में हम समाज के द्वारा दिया गया है,उसी प्रकार उस ईश्वर का नाम भी हमारे समाज द्वारा दिया गया है। यदि मैं कहूं कि ईश्वर बेनाम है तो इसे सभी को मानना होगा। हम मानवों के द्वारा ईश्वर का रूप और नाम देने से अथवा न देने से उस ईश्वर की शक्ति में किसी प्रकार भी परिवर्तन नहीं होगा। इतिहास में देखें तो पता चलता है हर एक जाति और संप्रदाय का मूल एक व्यक्ति से संबंध है, आज एक व्यक्ति कहीं जिला बनकर है तो एक संप्रदाय कहीं देश बनकर उपस्थित है। उस मूल एक व्यक्ति का नामकरण किसी ईश्वर ने नहीं किया। समाज के द्वारा समाज नाम और संप्रदाय का नाम आगे बढ़ा और आज चल रहा है। समाज के द्वारा ही ईश्वर का नामकरण कर दिया गया और आज उस ईश्वर के नाम के लिए अपने स्वार्थ को सिद्ध कर रहे हैं।

ईश्वर किसका  मोहताज
ईश्वर को हम किस रूप में भजें , यह हमारी सोच है, और इसे पूर्ण रूप से हमारे अंदर के विचारों के द्वारा होना चाहिए। इस धरती के हर सभ्यता ने उस ईश्वर को अपने अनुसार से देखा है और अपने अनुसार से माना है। वह ईश्वर हमारे भावनाओं से कहीं दूर है, हमारे सोच से उसके वास्तविक शक्ति और नाम में परिवर्तन नहीं हो सकता। वह ईश्वर इतना शक्तिशाली है जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड को शक्ति प्रदान कर रहा है। जिस प्रकार पृथ्वी ब्रह्मांड के अंदर एकर राई के दाने के बराबर भी हैसियत नहीं रखती वैसे ही उस ईश्वर के सामने हम जीव का कोई शक्ति मतलब नहीं रखता। एक वह ईश्वर हीं है जिसके शक्ति से सारा संसार शक्तिमान होकर बैठा है।

जो जन्मा हुआ राम है उन राम को ब्रह्म का स्वरूप माना। यहां इस बात को दोहराना आवश्यक है। बहुत लोग यह संख्या में पड़ जाते हैं। राम जब जन्मा था और अंत हो कर चले गए उसके बाद वह ब्रह्म कैसे हो सकते हैं?

वास्तविक बात तो यही है जिन राम का चरित्र हम सुनते हैं। जिन राम का चरित्र हम सुनते हैं, और जिन राम का चरित्र हमारे ऋषि मुनि सुनाते आए हैं उन राम को उस ब्रह्म का स्वरूप माना।


सर्वशक्तिमान ईश्वर ब्रह्म
क्योंकि वह ईश्वर मात्र एक छोटे से अंश को लेकर संसार में आता है। वास्तव में वह ईश्वर उस रूप से कहीं गुना महान है और विशाल है। इसीलिए हमारे महान महात्माओं ने उस राम के बारे में अनेक प्रकार से संसार को समझाया है। राम के अर्थ को भी अनेक तरीके से विस्तार दिया है।

रमंति इति राम:। वह राम तो रोम-रोम में रहता है। वह वह राम नहीं है जो आया और चला गया। वास्तव में वह आराम तो अपने जन्म से पहले भी था और सदैव है। क्योंकि वास्तविक राम तो अजन्मा है। वह जो पूरे ब्रह्मांड के कण-कण में विराजमान है। कहते हैं राम से बड़ा राम का नाम है। अर्थात यह कहा जा सकता है कि नाम से हम जानते हैं, जिसे न जानते हो उसे पुकार नहीं सकते।

राम का नाम बड़ा न राम
वास्तव में राम का नाम और राम दोनों अलग नहीं है। व्यक्ति चाहे तो अपने विचारों में विभक्त कर के देख सकता है। क्योंकि यह राम शब्द उसी परम शक्ति के लिए निकला है, अथवा उसी परम शक्ति को राम शब्द से कहा गया है।

संसार उस परम शक्ति को कहां तक जानता है? यदि इस प्रश्न का सरल उत्तर दिया जाए तो यह संसार उसकी परम शक्ति ईश्वर को मात्र एक नाम तक जानता है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है,उस परम शक्ति को हम राम तक जानते हैं। राम का अनेक नाम हो सकता है, अथवा उस राम को हम अनेंक नामों में भजन कर सकते हैं। वास्तव में वह ईश्वर नाम से भी कहीं गुना बड़ा है, और वह नाम से कहीं बड़ा महान है।

वास्तव में उस ईश्वर को नाम में बांधा हीं नहीं जा सकता। जो स्वयं से बेनाम हो उसे हम नाम देकर क्या बन सकते हैं। संसार में ईश्वर का नाम देकर अपने आप को बांधा है वह ईश्वर तो सदैव स्वतंत्र है। संसार में नाम तो इसलिए महान है क्योंकि उस ईश्वर तक कोई अपनी मर्जी से नहीं पहुंच सकता। परंतु उस ईश्वर का नाम अपनी मर्जी से जरूर ले सकता है। उस ईश्वर का नाम सुख-दु:ख किसी भी क्षण ले सकता है। जीव उस ईश्वर का नाम अपने जीवन के हर लम्हों में ले सकता है। उस ईश्वर को कोई पाप छू नहीं सकता। उस ईश्वर को कोई अशुद्ध तत्व अशुद्ध नहीं कर सकता।

क्या वह वही राम है?  जो मंदिरों में रहता है। क्या वह वही राम है जिसे सनातन धर्म वाले श्रद्धा से जगत का ईश्वर और स्वामी मानते हैं। क्या वह वही राम है,जो अपने चार भाइयों के साथ आया और चला गया। क्या वह वही राम है जो पत्नी वियोग में दर्द को झेला।

वह राम क्या वही है जिसने पत्नी को राम राज्य की स्थापना के लिए त्याग दिया हो? क्या वह वही राम है जिस राम ने हनुमान को अपना परम प्रिय भक्त बताया?
क्या वह ईश्वर वही राम है जिसने पिता के आदेश से चौदह वर्ष का वनवास काटें? क्या वह वही राम है जो पिता के आदेश पर माता को पुत्र से चौदह वर्ष दूर रखा?
संसार में सवाल हजारों हैं और उसका उत्तर सिर्फ एक है। वास्तव में सर्वशक्तिमान राम तो एक ही है परंतु उस की लीलाएं अनेंक है।

वह राम कौन हैं।उस परम शक्ति ईश्वर के भक्त नाना प्रकार से ईश्वर की चिंतन कर, ईश्वर की खोज करने की कोशिश करते हैं। जो जितना आगे बढ़ता है ,समाज के लिए समाज में प्रकट कर देता है। आज तक एक से एक योगी तपस्वी ईश्वर के परम भक्त हुए। उन्हीं तपस्वीयों और योगियों की देन है। हम उस ईश्वर के बारे में इतना कुछ समझ सकते हैं।

उस राम के लिए श्री गोस्वामी तुलसीदास जी!  “श्री राम चरित्र मानस” में बहुत ही सरल शब्दों में अस्पष्ट बयां करते हैं।
तुलसीदास जी कहते हैं वह राम तो-

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥

वास्तव में ब्रह्म ईश्वर तो -वह बिना ही पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है, बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, बिना मुँह के ही सारे रसों का आनंद लेता है और बिना ही वाणी के बहुत योग्य वक्ता है।

तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥
असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥

शक्तिपुंज ईश्वर तो -वह बिना ही शरीर के स्पर्श करता है, बिना ही आँखों के देखता है और बिना ही नाक के सब गंधों को ग्रहण करता है । उस ब्रह्म की करनी सभीं प्रकार से ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती॥

हम सभीं मृत्यु लोक के निवासी हैं। यहां सभीं जन्म लेते हैं और सभीं का मृत्यु भी निश्चित होता है। इस लोक में कोई भी अमर नहीं है, इस लोक में यदि कोई देवता भी है तो वह भी वह अमर नहीं है। अर्थात इस धरती पर सब की मृत्यु होने वाली है। यहां सभी जन्मा हुआ है यहां कोई अजन्मा नहीं है। जो जन्मा है वह निश्चित तौर पर जाएगा।

वह ईश्वर तो वास्तव में इस लोक का है हीं नहीं। वह ईश्वर अलौकिक है। वास्तव में उस ईश्वर का महिमा पूर्ण रूप से किसी के द्वारा कहा ही नहीं जा सकता। उस ईश्वर के लिए भक्त अपने विचारों में कहीं भी गोता लगा सकते हैं।

यह सब चिंतन करने के बाद भी फिर सवाल आता है वह  राम कौन है? वास्तविक राम तो किसी के चिंतन में नहीं आने वाला है। अब तक के जो अनुभव में आया है,वह राम हर व्यक्ति के अंदर प्राण शक्ति बनकर विराजमान है।

प्राणशक्ति के बिना धरती के पंच तत्व का क्या काम?
जीव के अंदर प्राण है जो बिना इस प्रकृति के किसी काम का नहीं, ऐसा हम मान सकते हैं। प्राण के बिना शरीर और शरीर के बिना प्राण का कोई अर्थ नहीं है। जब दोनों का संयोग होता है तो दोनों ही अपना रंग दिखाते हैं। जीव के अंदर जो प्राण हैं वह ईश्वर का शक्ति अंश है और शरीर जगत माता प्रकृति है। इसे हम रामकथा के आधार पर आसानी से समझ सकते हैं।


वनवास के उपरांत जब राम राजगद्दी पर आसीन हुए तो हनुमान जी ने श्रीराम जी से प्रश्न किया। हे स्वामी! आपने इतना महत्वपूर्ण कार्य किया, एक से बढ़कर एक बलशाली राक्षसों का संहार किया। आपके अंदर मैंने कभी भी अहम नहीं देखा। आप वास्तव में जगत के ईश्वर हैं, और संसार में जो कुछ भी होता है सभीं आप ही करते हैं। इस संसार में आपके जितना शक्तिमान कोई भी नहीं है। आप स्वयं नहीं ब्रम्हांडनायक हैं।

श्री हनुमान की बात सुनकर राम जी हंस पड़े- वे बोले  ” हे पवन पुत्र हनुमान! वास्तव में मैंने कुछ नहीं किया, मैं कुछ करता हूं हीं नहीं! जो कुछ भी करना होता है वह स्वयं जगत जननी  जानकी करतीं हैं।”

हनुमान जी को आश्चर्य हुआ!
हनुमान जी श्री सीता जी के पास अपने शंका का समाधान के लिए गए। वहां श्री सीता जी ने यह स्पष्ट बताया- “हनुमान स्वामी का कथन सत्य है। वास्तव में स्वामी कभी कुछ करते हीं नहीं, वे तो एक जगह रह कर भी सर्वत्र व्याप्त हैं। वास्तव में जो कुछ भी करना होता है स्वामी का आश्रय लेकर मैं करती हूं।”

वास्तविक की वास्तविकता नहीं बदलता
विचार तंत्र एक बात को जोर देकर कहता है, किसी के ऊपर विचार थोपने से वास्तविकता नहीं बदलता। वास्तविक तो अपने आप में वास्तविक हैं। वह राम स्वयं मंदिर में नहीं बैठा हुआ है, क्योंकि उस अलौकिक राम तक हम नहीं पहुंच सकते हैं, इसलिए हमने उस राम को अपने सुविधा अनुसार अपने सामने रख रखा है। उस परम शक्ति राम को हम एक मंदिर और मूर्ति में नहीं बांध सकते। उस ईश्वर की शक्ति महज एक रूप तक निश्चित नहीं है।

परंतु यहां ऐसा भी नहीं है कि वह राम मंदिर में नहीं है अथवा मूर्ति में नहीं है। भक्त अपने चिंतन विचारों में एक मूर्ति के अंदर हीं सर्वशक्तिमान उस महान ईश्वर का दर्शन कर लेता है, यह उस भक्त का साधना है।वह राम कण-कण में विराजमान हैं। जब वह शक्ति सर्वत्र समान रूप से विराजमान हैं तो वहां मंदिर और मूर्ति में भी पूर्ण रूप से विराजमान हैं। इसमें किसी भी प्रकार से शंका की कोई गुंजाइश नहीं है।

राम के लिए मन में शंका
यदि वेदांत वास्तविक बात करें तो, वह राम कौन हैं, इसके लिए कौन क्या कहता है इसका चिंतन छोड़ दें। स्वयं चिंतन करे वह राम कौन है? दूसरे की भावनाओं के ऊपर चलकर अपने भावनाओं को जागृत नहीं किया जा सकता। उस ईश्वर को अपने भावनाओं में जागृत किए बिना उसका अनुभूति प्राप्त नहीं हो सकता।

कौन है जो मृत्यु के वक्त अपने साथ लेकर जाता है?
यह समस्त संसार जानता है, जीने के लिए समाज चाहिए, जीवन के लिए भोग चाहिए परंतु मृत्यु के वक्त चाहने के बाद भी कोई मिलता नहीं साथ जाने के लिए। महान से महान गुरु के शिष्य को इस संसार में ही छोड़ कर चले जाते हैं। सद्गुरु का काम सिर्फ मार्ग दिखाना होता है, वह कभी भी अपने साथ लेकर नहीं जाएगा।
इस प्रकृति में कोई भी अपने कर्म फल को दूसरे को हस्तांतरित नहीं कर सकता।

यदि उस ईश्वर को पाना है तो उस ईश्वर के चिंतन में हमें स्वयं को डूबाना होगा। कोई भी महान पंडित पूजन तो करा सकते हैं, पूजन की विधि बता सकते हैं, परंतु पूजन में सबसे मुख्य प्रयोग होने वाला श्रद्धा और ईश्वर में विश्वास स्वयं को जगाना किसी के बस की बात नहीं। सनातन धर्म में जो कुछ भी कर रहे हैं,उसके पीछे का अर्थ समझना होगा, उसके पीछे की भावनाओं को समझना होगा।

भक्ति के लिए यदि भावना जागृत ना हो तो क्या करें?
नहीं समझ में आए तो एक बार नहीं हजार बार प्रश्न करें, अपने प्रश्नों को उस वक्त करते रहें जब तक कि उसका उत्तर ना मिल जाए। न समझकर किया जाने वाला आध्यात्मिक कार्य कभी फलदाई नहीं हो सकता। यही यदी सांसारिकता को पाना है तो सांसारिक संबंधित कुछ भी कार्य में फल मिल सकता है। परंतु उस ईश्वर का सानिध्य पाने में सांसारिकता माध्यम हो सकता है इसके सिवा और कुछ नहीं।


वास्तव में राम का पूजन-ध्यान !  राम के लिए कहां होता है। प्रायः समाज में सांसारिकता को दृष्टि में रखकर राम को याद किया जाता है। वास्तव में लोगों को राम नहीं चाहिए राम के द्वारा दिया जाने वाला संसार चाहिए। वास्तव में उस ईश्वर के द्वारा दिया जाने वाला भोग चाहिए। सांसारिक वस्तुओं को पाने के लिए सभीं संकल्प करते हैं, परंतु उस राम को पाने के लिए कोई संकल्प नहीं करता। जितने भी व्रत और त्योहार किए जाते हैं सभीं अपने सांसारिकता को पाने का लक्ष्य रखकर किया जाता है।

राम के शरण में लोग इसलिए नहीं जाते कि उन्हें राम चाहिए, वास्तव में राम के द्वारा दिया जाने वाला भोग चाहिए। वास्तविक बात यही है कि ईश्वर और जीव के बीच में यही सबसे बड़ा रोग है।
संसार के भोग को पाने का लक्ष्य छोड़कर यदि ईश्वर को पाने का लक्ष्य किया जाए तो निश्चित तौर पर ईश्वर के तरफ आगे बढ़ने में सफलता मिल सकता।

श्री कबीर दास जी कहते हैं-
दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय ।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ।
अर्थात- दुःख में हर इंसान ईश्वर को याद करता है लेकिन सुख में सब ईश्वर को भूल जाते हैं। अगर सुख में भी ईश्वर को याद करो तो दुःख कभी आएगा ही नहीं।

वास्तव में बात करें तो व्यक्ति ईश्वर को नहीं, ईश्वर के द्वारा दिया जाने वाले भोग को भजता है। भोग को भजकर भोग हीं प्राप्त होगा ईश्वर की प्राप्ति कैसे हो सकता है। कोई व्यक्ति रोग को भजेगा, तो उसे निश्चित तौर पर रोग हीं मिलेगा। उसे अमरता कभी हासिल नहीं हो सकता।

राम की पूजा
सनातन साहित्य में श्री राम के कीर्ति की बहुत हीं विशाल व्याख्या है। राम और रामायण के ऊपर समाज में कुछ लोगों को शंका भी होता है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि राम एक आम मानव की तरह थे, वे जन्म लिए और मृत्यु के उपरांत चले गए।

जिन महापुरुष को ऐसा लगता है उनके अनुसार से राम का पूजा व्यर्थ है। फिर तो राम को सिर्फ उन्हीं को पूजा करनी चाहिए जो राम को अपना आदर्श मानते हैं। अथवा जो राम को सिर्फ उन्हीं को पूजा करनी चाहिए जो उनके कुल और खानदान से हो।

तुलसी बाबा श्री राम के लिए कहते हैं-
हरि अनंत हरि कथा अनंता।
कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
रामचंद्र के चरित सुहाए।
कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥

श्री हरि अनंत हैं, और उनकी कथा भी अनंत है। सब संत-भक्त लोग उसे बहुत प्रकार से सुनते और सुनाते हैं। उस ईश्वर राम का चरित्र अत्यंत सुहावना है। श्री रामचन्द्रजी के सुंदर चरित्र करोड़ों कल्पों में भी बखान नहीं किया जा सकता।

यदि राम शरीर वाला था तो वह एक मानव था। जो था मतलब अभी नहीं है, परंतु वास्तविक राम था नहीं!  वह तो है। जिस राम का सनातन साहित्य गुणगान करता है वह राम जन्म से पहले भी था, जन्म के उपरांत शरीर में भी था और संसार से जाने के बाद भी है।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।

अर्थात स्वयं भगवान कहते हैं- सज्जन और साधुओं की रक्षा करने लिए और पृथ्वी पर से पाप को नष्ट करने के लिए तथा दुर्जनों और पापियों के विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं हर युग में बार-बार अवतार लेता हूँ और समस्त पृथ्वी वासियों का कल्याण करता हूँ।

धर्म और अधर्म की तौल
प्रकृति को आवश्यकता थी उस ईश्वर की!  आवश्यकता था इसलिए वह राम बनकर आया। उस ईश्वर के आने से पहले से इंतजार हो रहा था। धर्म और अधर्म की गणना करना बहुत ही गंभीर विषय है। जो व्यक्ति निस्वार्थ चिंतन नहीं कर सकता, जो व्यक्ति स्वभाव से निर्गुण न हो वह धर्म को तुला पर तोल नहीं सकता।

ऐसा क्या है जो व्यक्ति को स्वतंत्र सोचने नहीं देता?
गुण है जो जीव को अपने आप में बांधकर रखता है। सभीं जीव अपने गुणों के गुलाम है। श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्ट रूप से व्यक्ति को तीन गुण से युक्त बताया गया है।

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु ॥ 
श्री भगवान् कहते हैं – शरीर धारण करने वाले सभीं मनुष्यों की श्रद्धा प्रकृति गुणों के अनुसार सात्विक, राजसी और तामसी तीन प्रकार की ही होती है, अब इसके विषय में मुझसे सुन।


हर व्यक्ति को मुख्यतः तीन गुणों से युक्त बताया गया है। व्यक्ति तामसी, राजसी, और सात्विक यह तीन प्रकार से गुणों से युक्त होकर हीं व्यक्ति अपना हर प्रकार का कार्य करता है। जो व्यक्ति इन तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है उसे गुनातीत कहा जाता है। अर्थात वह निर्गुण में प्रवेश कर जाता है। जो संसार में गुनातीत हैं वह बाहर से तीनों गुणों के लक्षण को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं और पहचान सकते।

जिस प्रकार व्यक्ति अपने अंदर के अवगुण को नहीं पहचानता अथवा व्यक्ति अपने अवगुण को भली-भांति समझ नहीं पाता। परंतु दूसरे के अवगुण को वह स्पष्ट रूप से देख पाता है उसी प्रकार जो गुनातीत न हो वह गुण का परिभाषा वास्तविक रूप से व्यक्त नहीं कर सकता।

सनातन धर्म में ईश्वर को पाने का एक बहुत ही सरल साधन है और वह यह है कि व्यक्ति स्वयं के अंदर उस ईश्वर को देखें अथवा ईश्वर के अंदर समस्त संसार को देखें। इसी क्रिया में भारत के महामानवों ने उस ईश्वर को अपने-अपने अनुसार से अपने  चिंतन रूपों में देखा। किसी गुनातीत ने उस ब्रह्म को कृष्ण में देखा, किसी गुनातीत महात्मा ने उस ब्रह्म को भगवान शंकर में देखा। उस गुनातीत को किसी महान महात्मा ने श्रीराम में देखा।

उस राम को कोई जबरदस्ती पूजन नहीं करता। वह राम तो कभी यह भी नहीं कह कर गया कि मेरे जाने के उपरांत तुम मेरी पूजा करो। उस राम ने अपने से यह भी नहीं कहा कि मैं हीं ईश्वर हूं। उस राम ने कभी यह भी नहीं कहा कि तुम मेरी मूर्तियां स्थापना करके मंदिर बनाओ।

सभी को सिर्फ राम के जैसा ही स्वरूप चाहिए, परंतु वह कल्पना नहीं कर सकता वह ईश्वर राम कितना महान है?
आज संसार में ऐसा कौन है जो राम को नहीं चाहेगा। हर स्त्री को राम के जैसा पति चाहिए। हर पिता को राम के जैसा पुत्र चाहिए। हर भाई को राम के जैसा बड़ा भाई चाहिए। हर मित्र को राम के जैसा मित्र चाहिए। सभीं गुरुओं को राम के जैसा शिष्य चाहिए। सभीं साधु पुरुषों को राम के जैसा रक्षक चाहिए। देश के एक-एक नागरिक को राम के जैसा राजा चाहिए।

जहां भी कहीं उत्तम चरित्र की बात आती है तो राम का नाम आगे आता है अथवा राम के द्वारा उत्तम किया गया प्रमाण सामने आता है। राम ऐसे हीं पूजा नहीं जाता। वह राम तो इतना महान है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। श्री राम का हर कार्य आज संसार का सबसे बड़ा आदर्श है।

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