“ऋषिकेश”—अर्थात् ऋषियों के रहने का विशाल स्थल। यह स्थान प्राचीनकाल से ही हिंदुओं के प्रमुख तीर्थस्थलों में एक माना जाता है। देवभूमि उत्तराखंड के चार धामों का प्रवेश द्वार होने के कारण इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय निकले विष को भगवान शंकर ने समीप के नीलकंठ महादेव में पान किया था, जिससे यह क्षेत्र दिव्यता और पौराणिक महिमा से ओतप्रोत हो गया।
ऋषियों का प्राचीन निवास
ऋषिकेश सदियों से महर्षियों, सिद्धों और तपस्वियों का प्रिय निवास स्थान रहा है। यहां अनेक महान संतों ने कठोर तप और साधना की है। आज भी यहां घाटों, आश्रमों और पहाड़ी वनों में अनेक संत-महात्मा एकांतवास कर अपनी साधना में लीन रहते हैं। जैसे भारत को देवभूमि कहा जाता है, उसी प्रकार देवभूमि की गोद में स्थित ऋषिकेश को आध्यात्मिकता का हृदय माना जाता है।
यदि ऋषिकेश का एक वाक्य में परिचय देना पड़े, तो निस्संदेह कहा जाएगा—
“यह ऋषियों का शहर है।”

गगनचुंबी पर्वतों से टकराती तेज हवाओं की निरंतर गूंज और उनके बीच से कल-कल बहती माँ गंगा की पवित्र धारा, मानो आगंतुकों का स्नेहपूर्ण स्वागत करती प्रतीत होती है।
—
श्री गंगा का अलौकिक सौंदर्य
ऋषिकेश का वास्तविक आकर्षण है — माँ गंगा। गंगा नदी के दोनों तटों पर सुन्दर घाट, आश्रम और मंदिर इसकी शोभा को और बढ़ाते हैं। किसी भी मौसम में यहां सैकड़ों साधु-संत और भक्त दर्शन, स्नान, ध्यान व पूजन करते दिखाई पड़ते हैं।
गंगा का विस्तृत रूप हिमालय की गोद में स्थित गंगोत्री से लेकर बंगाल के सागर तक फैला हुआ है, परंतु हर स्थान पर गंगा का स्वरूप अलग और विशेष है। गंगोत्री की यात्रा हर किसी के लिए संभव नहीं होती, पर ऋषिकेश वह स्थान है जहाँ सामान्य भक्त भी आसानी से पहुँचकर गंगा का पवित्र दर्शन कर सकते हैं।
ऊँचे पहाड़ों के बीच से निकलती नीली-स्वच्छ गंगा का दृश्य मन को मोह लेता है। तटों पर स्थित परमार्थ निकेतन, गीता भवन, कैलाश आश्रम और अन्य अनेक पवित्र स्थलों की उपस्थिति गंगा को और अधिक विशेष बनाती है।
—
संध्या आरती : दिव्यता का अनुपम क्षण
ऋषिकेश का सबसे पवित्र और मनोहारी अनुभव है—संध्या आरती।
परमार्थ निकेतन, गीता भवन तथा अन्य अनेक आश्रमों में प्रतिदिन एक ही समय पर गंगा की भव्य आरती सम्पन्न होती है। हजारों दीपों की ज्योति, मंत्रों की अनुगूंज और भक्तों के स्वर मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं कि लगता है जैसे आप प्राचीन भारत, ऋषियों और तपस्वियों के उस काल में पहुंच गए हों, जहां सनातन संस्कृति का वास्तविक स्वरूप दिखता था।
—
पर्यटन की दृष्टि से ऋषिकेश
एक दिन में ऋषिकेश को पूर्ण रूप से घूम पाना लगभग असंभव है, क्योंकि यहां दर्शनीय स्थलों की लंबी श्रृंखला है—
काली कमलीवाला आश्रम
परमार्थ निकेतन
गीता भवन
श्रीराम तप:स्थल
राम झूला
लक्ष्मण झूला
नवीन निर्मित झूला पुल
कैलाश आश्रम
त्रिवेणी घाट (जहाँ प्रतिदिन अनुष्ठान और कथाओं का आयोजन होता है)
त्रिवेणी घाट पर अक्सर तपस्वी संतों, कथा-वाचकों और साधकों के दर्शन होते रहते हैं।
—
तीर्थ और उसका वास्तविक स्वरूप
सभी तीर्थ अपने आप में विशेष होते हैं, अतः किसी की किसी से तुलना उचित नहीं कही जा सकती। लेकिन लेखक को अपनी बात स्पष्ट करने के लिए कभी-कभी तुलनात्मक रूप अपनाना पड़ता है।
कई तीर्थों में ऐसे तत्व भी मिल जाते हैं जो व्यापारिक लालसा में सीमा लांघकर तीर्थ की गरिमा को क्षति पहुंचाते हैं, जिससे आगंतुकों की आस्था आहत होती है। ऐसे मामलों पर सम्पूर्ण सनातन समाज को चिंतन करना चाहिए।
परंतु सौभाग्य से ऋषिकेश ऐसा स्थान है जहां ऐसे प्रसंग बहुत कम देखने को मिलते हैं। यह शहर आज भी अपने प्राचीन स्वरूप, आध्यात्मिक वातावरण और पवित्रता को पूर्ण रूप से संजोए हुए है। यहाँ आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु के मन को माँ गंगा और ऋषिकेश की दिव्य वाणी पवित्र कर देती है।
—
देवभूमि उत्तराखंड : एक सम्पूर्ण तीर्थ
धार्मिक दृष्टि से समस्त उत्तराखंड एक विशाल तीर्थ है। यदि किसी कारणवश पर्वतों के भीतर स्थित धामों तक पहुँचना संभव न हो, तो हरिद्वार के साथ ऋषिकेश का दर्शन अवश्य करना चाहिए।
माँ गंगा का यह पवित्र दर्शन न केवल मन को शांति देता है, बल्कि भक्तों का कल्याण भी करता है।