यत्र योगेश्र्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः |
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवो नीतिर्मतिर्मम || १८/७८ ||
यह श्लोक श्रीमद्भागवत गीता के अंत में संजय ने धृतराष्ट्र से कहा था। विचारणीय बात है इस श्लोक के पहले दिव्य दृष्टि युक्त श्री संजय संपूर्ण गीता का श्रवण कर चुके थे।
वे संपूर्ण गीता सुनने के बाद कहते हैं ‘ हे महाराज! जहां इस ब्रह्मांड को रचने वाले परम शक्ति ईश्वर हैं। जहां शरणागत भक्त के जैसे अर्जुन है, वहीं पर धन, ऐश्वर्य, विजय, शक्ति और नीति है ऐसा मेरा मत है।
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