सनातन पर अंधविश्वास

सनातन धर्म में रोग कहते हुए सूनों तो अफसोस होता है। सनातन अपनें पद्धति तथा विचार में सर्व स्वीकार्य संस्कृति को लेकर सर्वोत्तम है। परधर्मि इस पद्धति को मान देते हो न देते हो,  इसमें कोई आश्चर्य नहीं, सब के अपने विचार हो सकते हैं।

Sanatan par andhvishwas

यदि हम अपने सनातन पद्धति में करीब से देखें तो पता चलता है, यह रोग कोई बाहरी नहीं। कहते हैं किसी बाहरी से लड़ना आसान होता है, परंतु अपनों से कौन लड़े और कैसे लड़े। हर व्यक्ति समझता है उत्तम ज्ञान उत्तम चरित्र देता।

जब किसी को यह कहा जाए एक हीं कमरे में ज्ञान हैं उससे बाहर कुछ नहीं, व्यक्ति बाहर देखना भी चाहे तो देखने ना दिया जाए, एक व्यक्ति ने कह दिया कि कमरे में ही ज्ञान है और उसको मान लिया जाए। सभी समझते पर स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि स्वीकार करने का अधिकार नहीं है। किसी के ऊपर थोपा जाने वाला ज्ञान संपूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता।


जिस प्रकार एक स्वतंत्र देश में अभिव्यक्ति की आजादी को हीं आजादी माना जाता है, उसी प्रकार सनातन पद्धति के शब्दों का हो गया। इसमें सभी स्वतंत्र है, कुछ भी मानने के लिए और ना मानने के लिए।

कुछ ऐसे भी हैं जो अपने बाप को बाप नहीं मान सकते, दुनिया के सामने स्वीकार करने में शर्म आता है। दुनिया को चिल्ला चिल्ला कर कहते हैं मैं सनातनी हूं, और सनातन पद्धति को चूहे की भांति जड़ से कुतरे जा रहे हैं।

कहते हैं-
”किसी धर्म ग्रंथ को मानना या ना मानना मेरी मर्जी, किसी देवी देवता को मानना या ना मानना मेरी मर्जी। मैं सनातन में रहकर सनातन का मजाक उड़ाऊ या उसके एवज में मलाई खाऊं मेरी मर्जी।”  ऐसा कहने वाले, और अपने को सनातन का मानने वाले बहुत है।

ऐसा नहीं है, की इस प्रकार का मत रखने वाले, धर्म ग्रंथ के बारे में नहीं जानते। सनातन धर्म ग्रंथों में अनेकों जगह कहां गया, कोई भी व्यक्ति जो धर्म को लेकर, समाज में भ्रम फैलाता हैं, उससे बड़ा समाज का और धर्म का हानी करने वाला और कोई नहीं हो सकता।

प्राचीन इतिहास में देखें, तो इसी अपने सनातन पद्धति में जातिवाद का इतना बड़ा भ्रम फैलाया गया कि आज मानो एक सनातन से अनेक सनातन बन गया हो। इसी का फायदा इतिहास में अत्याचारी और क्रूरता से भरा व्यक्तियों ने सनातन पद्धति का नाश करने की कोशिश किया। यदि आज की स्थिति की बात करें तो पहले से ज्यादा अच्छा है।

इतिहास में एक मल्लाह का वंशज पांडव हुए। स्वयं श्री राम ने निषाद से दोस्ती की और एक भीलनी का जूठा खाया। सनातन पद्धति कहता है ”भला हो उन राम का और कृष्ण को मानने वाले का”  स्वयं श्री कृष्ण दासी पुत्र के घर खाना खा सकते हैं, जिसे हम अपना सर्वश्व मानते हैं, राम जुठे खा सकते हैं पर हम नहीं खा सकते।

यदि जन्म से हीं व्यक्ति का जाति निश्चित होता, और जाति में ही पैदा होता, तो आज इतने पंथ संप्रदाय और जातियां नहीं होता। जन्म से कोई व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता, अपने कर्मों से होता है। नन्हे से जन्मजात बच्चे को हम कभी चोर नहीं कह सकते । कारन उसके अंदर चोर का आचरण नहीं है।

वही बच्चा आगे जब चोरी करेगा तब जाकर चोर कहलायेगा। लोग कहते हैं गीता वर्णाश्रम का व्याख्या करता है, जाति धर्म की बात करता है। वास्तव में श्रीमद्भागवत गीता आचरण के अनुसार वर्णाश्रम का व्याख्या करता है।

इतिहास में आचरण को बदलने के लिए, अथवा श्रेष्ठ आचरण को प्राप्त करने के लिए, ग्रंथों में आचरण से संबंधित जातिवाद का व्याख्या किया गया। परंतु अफसोस की बात आज वही वर्णाश्रम रूपी जातिवाद व्यक्ति अपने को श्रेष्ठ बताने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
यदि अपने सनातन को बचाना है, सनातन पद्धति को बचाना है, अपने इष्ट का मान रखना है, तो अपने अंदर जातिवाद का ईर्ष्या न पालें।

किसी व्यक्ति के आचरण को महत्व दें। परमेश्वर कभी किसी खास का नहीं है, इसी तरह परमेश्वर के ऊपर किसी खास का अधिकार नहीं हो सकता। परमेश्वर सबके लिए बराबर है। सबको मान से जीने का अधिकार है, जिस प्रकार सम्मान राम ने निषाद और शबरी को दिया, श्री कृष्ण ने विदुर को दिया।

सनातन पद्धति में फैले इस जातिवाद के रोग को मिटाना होगा, आचरण तो रहेगा, आचरण मापदंड है,इसका साधारण सफल इलाज अपने अहम को छोड़कर, सबको मान देना। हम सबको वह समय याद करना होगा जब स्वामी शंकराचार्य के आदेश से एक समय सभीं जातिवाद छोड़कर अपने सनातन धर्म को बचाने में लग गए, उसका फल है कि आज, सनातन धर्म, सनातन पद्धति एक सर्वोत्तम मार्ग।

हमें किसी से लड़ने की जरूरत नहीं है, परंतु सभीं को अपने धर्म में निश्चित तौर पर मरने की जरूरत है। मानवता का श्रेष्ठ नाम सनातन पद्धति रूपी योग है, ”वसुधैव कुटुंबकम” यह संपूर्ण राष्ट्र एक परिवार है। सभी सनातनी एक परिवार है, इसे पूर्ण रूप से स्वीकार करना होगा।

श्री कृष्ण नें कोई युद्ध नहीं लड़ा, यदि युद्ध लड़े होते तो रणछोड़ नहीं कहलाते, और वे अपने यदुवंश को बचा लिया होते, परंतु वे तो धर्म की स्थापना के लिए आए थे। श्री राम ने युद्ध नहीं लड़ा, क्योंकि उन्हें लड़ने के लिए किसी बंदर और भालू की आवश्यकता नहीं थी, परंतु सबका साथ लिया, यदि श्री राम युद्ध लड़ते, तो सीता माता के लिए रोते नहीं, उन्होंने एक ऐसा चरित्र पेश किया, जो मानव में सर्वोत्तम हो।

सनातन धर्म में हर जगह से अच्छा है, मानो या ना मानो। यह हम पर है कि हम कौन से भगवान माने ,कौन से धर्म ग्रंथ माने, अथवा कौन से देवी देवता के ऊपर छींटाकशी करें ,या कौन से धर्म ग्रंथ का मजाक उड़ाए।

इतिहास गवाह है, समय ने हर एक मजाक उड़ाने वाले का, इसी दुनिया में मजाक बना दिया। हर एक व्यक्ति को सोचना होगा की क्या यूं ही हमें मजाक बनकर चले जाना है। क्या हमें सनातन धर्म के रोग को मिटाना नहीं है? वास्तव में भारतीय सनातन साहित्य है, सनातन है, तो यहां पूर्ण मानवता है।

इसे बचाने के लिए सभी सनातन वाले को जाति धर्म छोड़कर बचाना होगा, बचाने का प्रयत्न करना होगा। आज सब ठीक है, सब अपने जगह सोए पड़े, किसका इंतजार है, यह आवश्यक नहीं है धर्म युद्ध करना, व्यक्ति से जितना हो पाता है उतना करें, यदि नहीं कुछ हो पाता है,तो अपने परमेश्वर से निस्वार्थ  प्रार्थना करें।

धर्म तो चिंतन का विषय होता है, मनन का विषय होता है, आपके धर्म का चिंतन आपको ही करनी पड़ेगी। सभी को अपने सुयोग कर्म करते हुए धर्म का चिंतन करना पड़ेगा, इसी में अपना और संपूर्ण जगत का कल्याण हो सकता है। जो स्वयं अंधविश्वास का चादर ओढ़े हुए हैं वे सनातन में अंधविश्वास का भ्रम फैलाया करते हैं।

जो चंद बातों को सुनकर तुरंत अंदाजा लगा लेते हैं क्या गलत है और क्या सही है। जो बड़े-बड़े चिंतक और विचारक आज तक सिद्ध नहीं कर पाए उसे हमारे वेद पुराणों ने पहले से सिद्ध करके रखा है। जो श्रीमद्भागवत गीता के एक श्लोक को समझ नहीं सकते वह पूरे वेद भ्रम युक्त पेश की कोशिश करते हैं।

भारतीय संस्कृति के सामाजिक प्रचलन में कुछ अंधविश्वास हो सकते हैं अथवा पाये जा सकते हैं। परंतु वेद पुराणों में कहीं कोई अंधविश्वास नहीं है सब कुछ प्रमाणित है। जिसे हमारे वेद पुराणों पर भ्रम है वह वास्तव में स्वयं भ्रमित है। वैसा व्यक्ति एक प्रकार से लाइलाज़ बीमारी से ग्रसित है।

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