संसार में यदि चरित्र के मापदंड की बात की जाए तो श्रीराम कथा से उत्तम उदाहरण कोई दूसरा नहीं हो सकता। श्रीराम कथा लोगों ने अनेक बार और अनेक प्रकार से सुनी है। लगभग प्रत्येक व्यक्ति रामायण के प्रमुख पात्रों के बारे में जानता और समझता है। आज चर्चा श्रीराम कथा की।
रामचरितमानस में एक प्रसिद्ध दोहा है—
मंगल भवन, अमंगल हारी।
द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥
अर्थात—जो स्वयं मंगल के स्वरूप हैं, जिनके पास मंगल का भंडार है, जो सभी प्रकार के अमंगल को हरने वाले हैं—वे दशरथनंदन श्रीराम हमारे ऊपर कृपा करें।

परमेश्वर का नाम ही पवित्र माना गया है। जो सदैव निर्दोष है, जो हर प्रकार से मंगल करने में समर्थ है, जो सबसे बड़े दुर्भाग्यों का नाश करने वाला है—वह एकमात्र परमेश्वर श्रीराम ही हो सकते हैं। संसार में कुछ लोग श्रीराम को केवल जन्मा हुआ मानव मानते हैं, जबकि सत्य यह है कि राम जन्म से पहले भी विद्यमान थे और देह-त्याग के बाद भी हैं। सामान्य मनुष्य द्वारा किए गए आश्चर्यजनक कार्य को करिश्मा कहा जाता है और करिश्मा करने वाले को लोग ईश्वरतुल्य मानते हैं। यदि श्रीराम के चरित्र, कर्म, त्याग, प्रेम और शासन पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि उनकी तुलना किसी से हो ही नहीं सकती।
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श्रीराम कथा का संक्षिप्त रूप
एक राजा—दशरथ—वृद्धावस्था में दीर्घ तप और यज्ञों के पश्चात चार पुत्रों की प्राप्ति करते हैं। चारों राजकुमार गुरु-आचार्यों से शिक्षा-दीक्षा पाते हैं। एक राजऋषि के यज्ञ की रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण वन में जाते हैं। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद जनकपुर में राम धनुष भंग करते हैं और सीता का स्वयंवर संपन्न होता है। इसके बाद भाइयों का विवाह सीता की बहनों से होता है।
राजा दशरथ श्रीराम को युवराज घोषित करते हैं, परंतु यह निर्णय रानी कैकयी को अस्वीकार्य प्रतीत होता है। वह अपने दो वरदानों के प्रभाव से राम को वनवास और भरत को राज्य प्रदान करने की मांग करती है। पिता द्वारा अनिच्छा के बावजूद, राम माता कैकयी के सम्मान और पितृवचन की मर्यादा निभाते हुए सीता और लक्ष्मण के साथ वनगमन करते हैं।
भरत बहुत आग्रह करते हैं, किंतु श्रीराम मातृवचन के अनुसार चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करते हैं। भरत स्वयं संन्यासी भाव से नंदिग्राम में रहकर राज्य का संचालन करते हैं। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वन में ऋषियों से मिलते हुए पंचवटी पहुंचते हैं। वहाँ मायावी स्वर्ण-मृग आता है। सीता उसके मोह में पड़ती हैं और राम उसके पीछे जाते हैं। लक्ष्मण भी पीछे जाते हैं। तभी रावण ऋषि वेश बनाकर सीता के समीप आता है और मर्यादा भंग कर उनका अपहरण कर ले जाता है।
राम और लक्ष्मण व्यथित होकर सीता की खोज करते हैं। मार्ग में उन्हें हनुमान मिलते हैं—एक अद्भुत भक्त और सेवक। हनुमान की प्रेरणा से राम और सुग्रीव की मित्रता होती है। सुग्रीव की सहायता हेतु राम बाली का वध करते हैं। हनुमान सीता की खोज में लंका जाते हैं, उनसे मिलते हैं और लंका दहन करके वापस लौटते हैं।
राम की सेना समुद्र पर सेतु बनाकर लंका पहुँचती है। रावण और राम में भीषण युद्ध होता है और रावण सहित उसका कुल नष्ट होता है। विभीषण को लंका का राज्य मिलता है। लोकमर्यादा हेतु श्रीराम सीता की अग्निपरीक्षा लेते हैं और तत्पश्चात अयोध्या लौटते हैं। वहां राम का राज्याभिषेक होता है और रामराज्य की स्थापना होती है। अनेक वर्षों तक धर्मसम्मत शासन करने के बाद श्रीराम अपने लोक को प्रस्थान करते हैं।
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क्या श्रीराम कथा इतनी ही है?
रामचरितमानस में एक चौपाई है—
हरि अनंत, हरि कथा अनंता।
कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
रामचंद्र के चरित सुहाए,
कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥
अर्थात—हरि अनंत हैं और उनकी कथा भी अनंत है। श्रीराम का चरित्र मनोहर, माधुर्यपूर्ण और कल्याणकारी है। इसे संतजन विविध रूपों में कहते-सुनते रहते हैं। करोड़ों कल्प बीत जाएँ, फिर भी उनके चरित्र का पूर्ण वर्णन संभव नहीं।
जो लोग श्रीराम को केवल जन्मा हुआ मानव मानते हैं, वे कथा का यह सीमित रूप ही जानते हैं। परंतु जो जानते हैं कि श्रीराम अनादि-अनंत हैं, उनके लिए रामायण का प्रत्येक पात्र और प्रत्येक प्रसंग ईश्वर की महिमा का अनंत विस्तार है। भक्तों की संख्या अनंत है, अतः उनके द्वारा समझी गई और कही गई कथा भी अनंत है।
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रामायण : अतुलनीय चरित्रों का संगम
रामायण में केवल श्रीराम ही विशेष नहीं हैं—प्रत्येक पात्र अनुपम है।
रावण से बड़ा कोई राक्षस नहीं मिलता।
भरत जैसा भाई और प्रजा-सेवक दुर्लभ है।
लक्ष्मण जैसा आज्ञाकारी और सेवाभावी भाई अद्वितीय है।
शत्रुघ्न जैसा अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ पात्र मिलना कठिन है।
श्रीराम ने सभी की मर्यादा रखी। वे गुरु के परमप्रिय, पिता के आज्ञाकारी और एकपत्नीव्रती थे। राजकुमार होते हुए भी वनवास का वरण किया। सन्यासी जीवन जीते हुए ऋषि-मुनियों का कल्याण किया। सुग्रीव को राज्य दिलाया पर स्वयं भोग नहीं किया। रावण को मारकर सोने की लंका विभीषण को सौंप दी। सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए शबरी के जूठे बेर खाए और निषादराज को अपना मित्र बनाया। राजधर्म की मर्यादा रखते हुए लोकमत को सर्वोच्च स्थान दिया।
राजा होकर भी वे पूर्ण कर्मयोगी रहे। इसलिए कहा जाता है—परमेश्वर आए, निष्काम भाव से कर्म किया और चले गए।
निष्कर्ष अमृत
रामचरितमानस केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला सनातन मार्ग है। श्रीराम का चरित्र मानवता के लिए सर्वोत्तम आदर्श है। त्याग, मर्यादा, प्रेम, करुणा और सामाजिक समरसता—ये सभी गुण श्रीराम में पूर्ण रूप से विद्यमान हैं। इसलिए कहा जाता है—
श्रीराम अतुलनीय हैं,
रामायण अतुलनीय है,
और सनातन धर्म अनादि व अनंत मार्ग है।