स्वदेशी उपयोग हीं स्वदेशी सहयोग!

स्वदेशी शब्द भारतीय इतिहास में अपना एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह शब्द उन दिनों आया जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था। स्वदेशी शब्द का विशेष कर प्रचार प्रसार महात्मा गांधी जी के द्वारा हुआ। एक समय वह था जब देश में अपने खेत से नमक उगाने पर भी टैक्स लगता था। अर्थात यह कह सकते हैं कि नमक उत्पादन के ऊपर भी विदेशी का कब्जा था। साथ ही जो कपड़े आते थे वह विशेष कर उच्च गुणवत्ता वाले कपड़े सब विदेश से आयात होता था।

Vichar Tantra



कुछ चुनिंदा मील था वह भी विदेशियों के हाथ में था। यदि भारत का कोई कपड़ा था तो वह खादी! जिसे महात्मा गांधी ने एक उद्योग का रूप दिया। आज उसी खादी को खड़ी ग्राम उद्योग के नाम से जाना जाता है। भारत में अपना कोई ब्रांड नहीं था। इसी स्वदेशी शब्द को आगे बढ़ाने के लिए महात्मा गांधी ने पूरे देश में अपने लोगों द्वारा सभी विदेशी कपड़ों को चौकों पर जलवा दिया था।

स्वदेशी इस्तेमाल करने का अर्थ यह नहीं होता कि विदेशी से नफरत है। परंतु विदेशी वस्तु खरीदने के लिए कोई वाद्य नहीं कर सकता। अथवा अपना देश किसी वस्तु के लिए पूर्णतया विदेशों के ऊपर आश्रित हो यह भी उचित नहीं। बहरहाल हम यहां बात विदेशी वस्तुओं की नहीं कर रहे हैं। हम अपने स्वदेशी वस्तुओं की चिंतन विचार करेंगे।

स्वदेशी वस्तुओं का मतलब क्या है। अपने देश का बना अपने देश में इस्तेमाल हुआ। अपने देश का माल अपने देश में बिका। अपने देश में बिका हुआ माल का मुनाफा अपने देश में ही फैला। स्वदेशी वस्तु कि सबसे बड़ा फायदा यह है कि हम भारतवासियों को एक दूसरे के बढ़ने में मदद करेगा।

मैं यहां अपना एक अनुभव शेयर करूंगा। बचपन में मैं जब बाजार सब्जी खरीदने जाता था तो एक रूपए अधिक देना भी दिल को खटकता था। परंतु जैसे-जैसे बड़ा हुआ और दुनिया को समझा तो पता चला एक रुपए ज्यादा देना भी हमारा व्यर्थ नहीं जाता। वह कैसे किसी को हम ज्यादा देकर फायदे में कैसे रह सकते हैं यह भी दिल में उठ रहा होगा।

वह ऐसे की समाज एक दूसरे से बना है। बहुत लोग जनसंख्या में ऐसे हैं जो सिर्फ अपना पेट भरने के लिए ही हमेशा परेशान रहते हैं। उनमें कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कोई दो को पेट भरता है, कोई दस को भरता है, कोई हजारों का भरता है, कोई लाखों भी पेट भरने वाला है। जो व्यवसाय करते हैं और व्यवसाय के माध्यम से दूसरों को आमदनी हुआ करती है। अर्थात एक व्यापारी स्वयं तो व्यापार करके मुनाफा करता है साथ में उसके मातहत दूसरे की भी जीविका चलती है।

यहां पर यह कह सकते हैं कि सब एक दूसरे की भागीदारी से अपनी जीविका चला रहे हैं। कोई भी घर बनाना चाहता है तो वह किसी गांव अथवा मोहल्ले में ही घर बनाता है। कोई रहना चाहता है तो अच्छे समाज में रहना चाहता है। अर्थात गांव अथवा मोहल्ले अथवा समाज के बिना हमारा गुजारा नहीं हो सकता। यानी की हम किसी को कुछ दे नहीं रहे हैं अथवा बिना मतलब का कोई दूसरा भी हमें कुछ नहीं देता। फिर भी हम एक दूसरे पर आश्रित हैं।

एक मोहल्ले में रहने वाला जिससे हमारा कभी बातचीत नहीं होता उसका हमारे जीवन में कंट्रीब्यूशन है इस बात को मानना पड़ेगा। एक सब्जी वाले से जब हम सब्जी खरीदने हैं तो उसके परिवार में हमारा कंट्रीब्यूशन होता है।  इस प्रकार समाज के अंदर जहां कहीं भी हम उपभोक्ता बनते हैं तो हमसे कुछ समाज के अंदर साझा होता है। वैसे ही अन्य दूसरे लोगों का हम सब के जीवन में किसी न किसी रूप में साझेदारी होती है।

जैसे गांव की चर्चा हुआ जैसे समाज का चर्चा हुआ वैसा शहर का चर्चा होगा। शहर के आधार पर अपने देश का चर्चा होगा। अर्थात हम अपनें मोहल्ले से कुछ खरीद कर रहे हैं तो अपने मोहल्ले को पोषित करने का भागीदार बनते हैं। वैसे हीं अपने किसी बाजार से कोई चीज खरीदने हैं तो वह बाजार हमारे द्वारा फलने फूलने का कारण बनता है।  ठीक ऐसे ही जब हम अपने देश की बनी हुई वस्तुओं का या कहें अपने स्वदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल करेंगे तो देश को बनाने में हम भी भागीदार होंगे।

स्वदेशी इस्तेमाल का मतलब हमारा भारत मजबूत होना। भारत मजबूत होगा तो हम सब मजबूत होंगे। जाने अनजाने में भारत का हर एक नागरिक का हर एक नागरिक के‌ जीवन में कुछ प्रतिशत एक दूसरे के जीवन में भागीदारी है। यदि हमारा देश मजबूत हुआ और उसके बाद कुछ विदेशी सामान का उपयोग कर भी लिए तो विशेष फर्क नहीं पड़ेगा। परंतु मजबूत होने से पहले यदि हम विदेशी वस्तुओं का उपयोग करेंगे तो परदेस मजबूत होगा और हमारा देश कमजोर हीं रहेगा।

दूसरा दूसरों पर आश्रित होने का अर्थ देश का प्रत्येक व्यक्ति समझता है। गांधी जी ने कहा था
“हम विदेशी नमक नहीं अपना नमक बनाएंगे और घर का नमक खाएंगे। हम विदेशी कपड़ा रोड पर जलाएंगे और अपना कपड़ा बनाकर अपना कपड़ा ही उपयोग में लायेंगे।”

किसी भी विषय पर सोच तो बहुत बड़ी बात है और ना सोचे तो कोई बात नहीं। जिसकी भावनाए मर चुकी हो वह सोच विचार भी नहीं सकता। एक भिखारी को पांच देकर हम सोचते हैं कि हम उन्हें बहुत बड़ा कार्य किया है। परंतु पैसे देकर अपने आप को बड़ा मानने के बजाए यह विचार करें कि उसकी जीवन में हमारा भी कुछ कंट्रीब्यूशन है। सब्जी वाले ने यदि किसी सब्जी पर पांच रुपए ज्यादा ले लिया तो यह सोचें की सब्जी वाले के परिवार को चलाने में कुछ भागीदारी आपकी भी है।


स्वदेशी उपयोग हीं स्वदेशी सहयोग!
“कहते हैं समय से पहले और किस्मत से ज्यादा
न किसी को कुछ ना मिला है ना मिलेगा।”

कोई ऐसा भी होता है जो इकट्ठा करते-करते जीवन पर्यंत बहुत इकट्ठा करता है परंतु उसका उपभोग कोई और करता है। दूसरे का हक छींनकर उपभोगी बनने के बजाय हंसकर दूसरे के जीवन में कुछ भागीदारी करें इससे उत्तम आनंददायक और क्या होगा। यह भी सोचने की आवश्यकता नहीं है कि वह सामने वाला या मानेगा अथवा मानता है कि नहीं। कि आपने उसके जीवन में कुछ सहयोग किया है। क्योंकि कोई देखे अथवा ना देखे यहां प्रकृति पल-पल हर चीज की गणना करती जाती है।

अब सोचेंगे स्वदेशी के ऊपर हम कहां इतनी लंबी चौड़ी भाषण देने लगे। क्षमा चाहेंगे परंतु स्वदेशी को समझने के लिए पहले अपने स्वदेश को समझना अत्यंत आवश्यक है। जैसे हम हृदय से कहते हैं भारत इस विश्व का सबसे महान देश है। यह वह भारत भूमि है कि यहां जो आया सब ने शरण पाया। सबसे ज्यादा बोलने वाली भाषा, सबसे ज्यादा मिश्रित संस्कृति। अनेक समूहों को अपनें अंदर समेटे भारत देश पूरे विश्व को चिड़ा-चिढ़ाकर कहता है क्या तुम मेरे जैसा बन सकते हो?

यह हम भी जानते हैं और आप भी जानते हैं भारत के जैसा बन जाना किसी दूसरे देश के बस की बात नहीं। यह भारत के विचारधारा हमने अनेक कष्ट से पाया है। यह कहें आज की भारत की जो विरासत रूपी विचारधारा है इसे हमारे पूर्वजों ने बहुत मेहनत से संजो कर रखा था जिसका आज हम पालन करते हैं। हमारे प्रत्येक पूर्वजों का आज के संस्कृति में खून और पसीना दोनों लगा हुआ।

हम अपने स्वदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल करने का संकल्प लें। हम अपने स्वदेशी ब्रांड को महत्व देने का संकल्प लें। क्योंकि स्वदेशी ब्रांड बनाने वाले के अंदर हमारे अपने किसी भाई का पसीना बहा है। अपने स्वदेशी ब्रांड में हमारे अपने भारतीयों का सहयोग है। हम यह न सोचे की स्वदेशी ब्रांड में हम कुछ पैसे ज्यादा देकर ठगे जा रहे हैं। हम किसी पराए को नहीं अपनों को दे रहे हैं। हम अपने देशवासियों को सहयोग कर रहे हैं। जैसे एक लीटर पेट्रोल अथवा डीजल को दिए सरकारी टैक्स का पैसा वापस चल कर हमारे आपके सामने हीं आता है। वैसे हीं  आपके द्वारा स्वदेशी में लगाया हुआ पैसा वापस आपके पास हीं चल कर आएगा अथवा आपके जीवन में सहयोगी बनेगा।

इसलिए अपनें स्वदेशी वस्तुओं का, स्वदेशी ब्रांड का दिल से स्वागत करें, दिल से सहयोग करें। स्वदेशी शब्द का प्रचार कर महात्मा गांधी को उस समय कोई लाभ नहीं हुआ। परंतु उन्होंने अपने बच्चों अपने देश के भविष्य को सोचा। आज यदि आप अपनें स्वदेशी को आगे बढ़ते हो तो यह आपके बच्चों का भविष्य को उज्जवल करेगा। आपके देश के भविष्य को उज्जवल करेगा। एक बार फिर कहूंगा अपने समस्त पूर्वजों को याद करें और अपनें स्वदेशी को सहयोग करें। यह संकल्प लें कि हम अधिक से अधिक स्वदेशी का उपयोग करेंगे और अपने स्वदेशी का सहयोग करेंगे।

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