Dharm Vichar

दुःख के कारण

जीवन एक निरंतर परिवर्तनशील धारा है, जिसमें सुख और दुःख दोनों प्रवाहमान हैं। जैसे दिन के बाद रात आती है और वर्षा के बाद धूप खिलती है, वैसे ही जीवन में भी सुख के साथ दुःख का आना स्वाभाविक है। परंतु समस्या यह है कि मनुष्य सुख के क्षणों में इतना तल्लीन हो जाता है […]

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माता को माता मत कहो

किसी को धरती को माता कहने में तकलीफ होता है। गंगा को गंगा माता कहने में तकलीफ होता है। प्रकृति को माता कहने में तकलीफ होता है। पंचतत्व से निर्मित यह प्रकृति अनेक जीव और वनस्पतियों का निर्माण करती है। एक दिन अंत समय में सभी निर्माण वनस्पति और जीव स्वत: पंचतत्व में विलीन हो

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वैदिक पूजन व्यर्थ

शास्त्रोक्त जो भी पूजन क्रिया पूजन के लिए प्रचलित है। वह सभी एक भक्त के द्वारा अंतःकरण की भावना को प्रस्तुत  करने के लिए है। परंतु आश्चर्य की बात है आज के समय प्रयोजन के लिए क्रिया किया जाता है , वह प्रयोजन मात्र क्रिया बनकर रह गया है और क्रिया सिर्फ एक दिखावा के

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