Ramayan

सनातन में ईश्वर नहीं थोपे जाते, चुने जाते हैं

सनातन धर्म में रामायण एक अद्वितीय ग्रंथ है, और उसमें वर्णित पुरुषोत्तम श्रीराम का चरित्र सर्वोपरि माना जाता है। रामायण केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक चरित्र-प्रधान ग्रंथ है, जो अनेक भाषाओं और टीकाओं में उपलब्ध है। समाज में इस ग्रंथ के साथ-साथ उसमें वर्णित चरित्रों की पूजा भी होती है। फिर भी कुछ लोग […]

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श्रीराम कथा : चरित्र का चरम आदर्श

संसार में यदि चरित्र के मापदंड की बात की जाए तो श्रीराम कथा से उत्तम उदाहरण कोई दूसरा नहीं हो सकता। श्रीराम कथा लोगों ने अनेक बार और अनेक प्रकार से सुनी है। लगभग प्रत्येक व्यक्ति रामायण के प्रमुख पात्रों के बारे में जानता और समझता है। आज चर्चा श्रीराम कथा की। रामचरितमानस में एक

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राम-रामायण और भ्रम

राम-रामायण और चरित्र यह श्रीराम से अलग नहीं हो सकता। राम के रहने का जो मुख्य स्थान है, वह रामायण है। राम अनंत है और राम का चरित्र भी अनंत है। चर्चा चिंतन के बाद अनेंक प्रकार की संका समाज के अंदर उत्पन्न होता है और व्यक्ति अपने तरीके से उन शंकाओं का समाधान निकालने

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भक्ति रस एक अमृत

भक्ति हीन गुण सब सुख कैसे,लवण बिना बहु व्यंजन जैसे।भक्ति हीन सुख कवने काजा,अस बिचारि बोलेऊं खगराजा॥ अर्थात : भक्ति के बिना गुण और सब सुख ऐसे फीके हैं, जैसे नमक के बिना विभिन्न प्रकार के व्यंजन। भजन विहीन सुख किस काम का। यह विचार कर पक्षीराज कागभुशुण्डि जी बोले। इस सुन्दर चौपाई चौपाई के

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एक राजकुमार आया था- एकादश रामायण-01

एक राजकुमार आया थापिता के अनेक यतन से था।आते ही वह सबके मन को भाया थाब्रम्ह स्वयं राम रुप में आया थाऔर वह अकेले नहीं अनेंक सेवक तथाअपनी सदैव की सहयोगीनी एवं जगत मातामहामाया को भी साथ लाया था एक राजकुमार आया थास्वयं ब्रम्ह होकर मनुष्य का जीवन जीने आया थावह मनुष्य जीवन जीते हूए

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गुरु ज्ञान और ईश्वर

गुर बिनु भव निध तरइ न कोई।जौं  बिरंचि  संकर  सम  होई॥ तुलसी बाबा गुरु के महत्व के बारे में कहते हैं:  गुरु के बिना कोई भी भवसागर पार नहीं कर सकता, चाहे वह ब्रह्मा जी और शंकर जी के समान ही क्यों ना हो। गुरु का हमारे जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। गुरु के

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अमृत छोड़ विष सेवन

एहि तन कर फल बिषय न भाई।स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं।पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥ ये श्री रामचरितमानस का बहुत चर्चित दोहा है। तुलसी बाबा यहां स्पष्ट कहते हैं।  हे भाई! इस शरीर के प्राप्त होने का फल विषयभोग नहीं है। क्योंकि शरीर के सामने  स्वर्ग का भोग भी बहुत

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बोए पेड़ बबुल के

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं।नाथ पुरान निगम अस कहहीं।। समस्त ग्रंथों का सार श्री रामचरितमानस में तुलसी बाबा कहते हैं: पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि और कुबुद्धि  सबके हृदय में रहती है। अर्थात अच्छी बुद्धि और दुष्ट बुद्धि सबके हृदय में रहता है। तुलसी बाबा अपने विचार से कहते हैं- अच्छा

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रामचरितमानस चिंतन-विचार

एहि महँ रघुपति नाम उदारा।अति पावन पुरान श्रुति सारा॥मंगल भवन अमंगल हारी।उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥ श्री तुलसीदास जी महाराज रामचरितमानस के लिए अपना विचार रखते हुए कहते हैं  : रामचरितमानस में श्री रघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यन्त पवित्र है, वेद-पुराणों का सार है, मंगल  करने वाला और अमंगल को हरने वाला है,

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विचारों से कर्म और सफलता

अनुचित उचित काज कछु होई,समुझि करिय भल कह सब कोई। तुलसी बाबा कार्य में सफलता के लिए स्पष्ट कहते हैं: किसी भी कार्य का परिणाम उचित होगा या अनुचित, यह जानकर करना चाहिए, उसी को सभी लोग भला कहते हैं। जैसे कहा गया है धनुष से तीर निकालने के बाद वापस नहीं होता। जिह्वा से

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