Shrimad Bhagwat Geeta

अमृत गीता- ज्ञान का मूल

महानुभाव! श्रीमद्भागवत गीता के बारे में कितना भी कुछ कहा जाए, कम होगा। राम को पसंद करने वाले राम की भक्ति करते हैं। कृष्ण को पसंद करने वाले कृष्ण की भक्ति करते हैं। शिव को प्रसन्न करने वाले शिव की भक्ति करते हैं।इसमें यह कहते हुए किसी प्रकार भी किसी को भी दुविधा नहीं होना […]

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प्राकृतिक सिद्धांत का मूल – गीता

श्रीमद्भागवत गीता एक ऐसा ग्रंथ है, कि शायद ही कोई ऐसा हो जो इनके बारे में ना जानता हो। सनातन पद्धति के लिए अनेकों वेद पुराण ग्रंथ मौजूद है। सभी अपने आप में परिपूर्ण है, वास्तव में किसी से किसी की तुलना नहीं हो सकता, परंतु गीता जी के लिए कहा गया है की गीत

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डर को भगाओ

डर उसको लगता है जिसे सिर्फ अपनें ऊपर भरोसा रहता है।  वहीं जिसे ईश्वर पर भरोसा हो उसे डर और भविष्य की चिंता नहीं होता। मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |अगामापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || २/१४ || हे कुन्तीपुत्र! सुख तथा दुख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अन्तर्धान होना सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने

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इंद्रियों की भोग शक्ति

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः |रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते || २/५९ || भगवान श्रीमद् भागवत गीता में अर्जुन से कहते हैं –  देहधारी जीव इन्द्रियभोग से भले ही निवृत्त हो जाय पर उसमें इन्द्रियभोगों की इच्छा बनी रहती है | लेकिन उत्तम रस के अनुभव होने से ऐसे कार्यों को बन्द करने पर वह भक्ति

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मानव में त्रिगुण का जाल

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || २/४५ || भगवान श्रीमद् भागवत गीता में अर्जुन से स्पष्ट कहते हैं।वेदों में मुख्यतया प्रकृति के तीनों गुणों का वर्णन हुआ है ।हे अर्जुन! इन तीनों गुणों से ऊपर उठो | समस्त द्वैतों और लाभ तथा सुरक्षा की सारी चिन्ताओं से मुक्त होकर आत्म-परायण बनो ।

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अजन्मा आत्मा

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |अजो नित्यः शाश्र्वतोऽयं पुराणोन हन्यते हन्यमाने शरीरे || २/२० || यहां भगवान  अपने विचार में स्पष्ट कहते हैं। “आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है न मृत्यु | वह न तो कभी जन्मा है, न जन्म लेता है और न जन्म

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सुख का दुश्मन

भोगैश्र्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् |व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ||२/ ४४ || अर्थात श्रीमद् भागवत गीता में भगवान कहते हैं – जो लोग इन्द्रियभोग तथा भौतिक ऐश्र्वर्य के प्रति अत्यधिक आसक्त होने से ऐसी वस्तुओं से मोहग्रस्त हो जाते हैं, उनके मनों में भगवान् के प्रति भक्ति का दृढ़ निश्चय नहीं होता। मनुष्य जन्म से हीं अपने

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ईश्वर का चिंतन-विचार

दिल में बसा ईश्वर का चिंतन कौन करै।जब मोह-माया से फुर्सत मिलै तब करै।। ईश्वर के चिंतक को निश्चित तौर पर मार्ग मिलता है। परंतु ईश्वर का चिंतक तो बनना पड़ेगा। जब ईश्वर से अटूट प्रेम होगा तब वह दिल में बस जाएगा। वास्तव में सबको सिर्फ आनंद चाहिए। वह जो सिर्फ आज का आनंद

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कर्म के द्वारा फल

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत |तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || २/३० || भगवान ने कितने सरल भाषा में अपने शब्दों को कहा है। वे अर्जुन से कहते हैं- “हे भारतवंशी! शरीर में रहने वाले (देही) का कभी भी वध नहीं किया जा सकता । अतः तुम्हें किसी भी जीव के लिए शोक करने की

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दुःख से भाग नहीं सकते

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |अगामापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || २/१४ || श्रीमद् भागवत गीता में सुख दुःख के ऊपर भगवान कितना सुंदर विचार रखते हैं। वे कहते हैं – हे कुन्तीपुत्र! सुख तथा दुख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अन्तर्धान होना सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है | हे भरतवंशी! वे

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