होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
यहां श्री गोस्वामी तुलसी बाबा अपने विचार में रहते हैं : “जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे।”
इस चौपाई के ऊपर अनेक लोगों का अनेकों प्रकार का मत है। परंतु यहां मेरा कहना है इसका क्या मत है वह उसका अपना मत है। इसके ऊपर आप अपने तरीके से स्वयं विचार कर सकते हैं। क्रिया का ना होना और सिर्फ चिंतन के आधार पर कुछ होने की कल्पना करना मूर्खता वाली बात हो सकता है।
आपने स्वयं देखा है जो क्रिया होता है तो उसकी प्रतिक्रिया भी होती है। क्रिया करना किसी के वश की बात हो सकता है परंतु प्रतिक्रिया समय बताता है। यहां पर हमारे महात्माओं का उत्तम विचार रहा है। वे कहते हैं कर्म करना किसी के वश की बात हो सकता है। परंतु कर्म फल किसी के वश की बात नहीं हो सकता।
कुछ यदि आप अच्छे तरीके से कर जाते हो तो इस बात से आप निश्चिंत हो कि कुछ होगा। क्योंकि कर्म करोगे तो फल भी होगा। सबको अपना कर्म उत्तम लगता है । अक्सर देखा समाज में व्यक्ति दूसरे के कर्म में नुक्स देखा है। परंतु उसके कर्म को कौन तौलेगा। उसका कर्म अच्छा है अथवा बड़ा इसका मापदंड उसके पास नहीं है।
इस किसी ने भी कुछ कर्म किया है वह अच्छा से किया अथवा बुड़ा से। वह स्वयं इसका प्रमाण दे और वही सही है यह मानन नहीं जा सकता। उसने कितना अच्छा किया अथवा कितना बुरा किया यह सिर्फ उसके विचार से जाना नहीं जा सकता।
खेत में हमनें बीज डाला है। जो हमारे वश में था हमने कर दिया। बीज अच्छा है या तो आप बुरा। वहां की भूमि उसके अनुकूल है अथवा प्रतिकूल। बीज डालने में सभी सिद्धांतों का पालन करने के बाद भी समय अनुकूल है अथवा नहीं। इन सब के बाद भी बीज जो ऊपर से दिख रहा है क्या अंदर भी वही है। इन सभी बातों पर किसान विचार कर सकता है। परंतु वह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता।
किसान के वश में था कर्म करना, उसने किया। बहुत अच्छे तरीके से किया। उसके आगे अब तुलसी बाबा कहते हैं राम की मर्जी है। अर्थात उसके आगे प्रकृति की मर्जी है कि बीज उगेगा अथवा नहीं। बीज के अंदर बैठा हुआ शक्ति अपना रंग दिखाएगी अथवा नहीं। यहां किसी के बहस करने से निष्कर्ष में कोई बदलाव नहीं आने वाला है।
इसी दृष्टि से जीवन के समस्त कर्मों को देखा जा सकता है। श्रीमद् भागवत गीता में भी भगवान कहते हैं “तेरा कर्म करने में ही अधिकार है। कर्म का फल तो निश्चित तू नहीं कर सकता।! इसीलिए यहां कहा गया है वही होगा जो ईश्वर ने भविष्य तय कर रखा है। अथवा जो ईश्वर भविष्य तय करेगा। कोई ईश्वर की शक्ति नहीं मानना चाहता तो ना माने। उसके मानने अथवा ना मानने से प्रकृति के सिद्धांत में कोई बदलाव नहीं होता ना होगा।
राम की जगह पर समय को कोई रख सकता है। क्योंकि समय स्वयं ईश्वर है। समय सब का भूत, भविष्य और वर्तमान सब जानता है। परंतु समय को कोई नहीं जानता। इन विचार की दृष्टि से देखा जाए तो जिस सिद्धांत को आप बदल नहीं सकते उस विषय पर चर्चा क्यों ? जब कर्म करना वश में है तो कर्म को सुंदर और अच्छे ढंग से किया जाए। कर्मफल किसी के वश की बात नहीं है। परंतु जितना उत्तम तरीके से कर्म किया जाएगा उसका फल भी उतना ही उत्तम होगा यह निश्चित है।