शास्त्रोक्त जो भी पूजन क्रिया पूजन के लिए प्रचलित है। वह सभी एक भक्त के द्वारा अंतःकरण की भावना को प्रस्तुत करने के लिए है। परंतु आश्चर्य की बात है आज के समय प्रयोजन के लिए क्रिया किया जाता है , वह प्रयोजन मात्र क्रिया बनकर रह गया है और क्रिया सिर्फ एक दिखावा के जैसा है। यही कारण है कि एक भक्त को अपने ईष्ट की निर्देश समझने के लिए किसी दूसरे का सहारा लेना पड़ता है। वैदिक परंपरा सर्वोत्तम है परंतु भावना विहीन कोई भी क्रिया व्यर्थ है।
पूजन क्रिया केवल एक औपचारिक
शास्त्रों में वर्णित पूजन क्रियाएँ केवल बाह्य कर्म नहीं हैं, बल्कि वे भक्त की आंतरिक भावना, श्रद्धा और समर्पण को व्यक्त करने का माध्यम हैं। इनका उद्देश्य आत्मा और ईश्वर के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करना है। किंतु आज के समय में अधिकांश पूजा-पाठ केवल दिखावा, परंपरा-निर्वाह या स्वार्थ सिद्धि का साधन बन गए हैं, जिनमें भावना और आत्मिक जुड़ाव की कमी है।
इस कारण होता है व्यक्ति ईश्वर से सीधे संवाद करने की योग्यता खो बैठा है और उसे अपने ईष्ट के निर्देश समझने के लिए बाहरी साधनों या व्यक्तियों पर निर्भर रहना पड़ता है। वैदिक परंपरा में क्रिया से अधिक भावना को महत्व दिया गया है, क्योंकि वही पूजा को सार्थक बनाती है। अतः भावना के बिना कोई भी पूजन क्रिया केवल एक औपचारिक या प्रदर्शन मात्र बनकर रह जाती है।