अनुचित उचित काज कछु होई,
समुझि करिय भल कह सब कोई।
तुलसी बाबा कार्य में सफलता के लिए स्पष्ट कहते हैं: किसी भी कार्य का परिणाम उचित होगा या अनुचित, यह जानकर करना चाहिए, उसी को सभी लोग भला कहते हैं।
जैसे कहा गया है धनुष से तीर निकालने के बाद वापस नहीं होता। जिह्वा से निकला हुआ शब्द वापस नहीं होता। वैसे हीं सुयोग किया गया कर्म अगर दूषित हो जाए तो वापस उसकी भरपाई नहीं हो सकता। सिद्धांत कोई भी कर्म करने से पहले अनेकों बार विचार करने की बात करता है।
यहां श्री रामचरितमानस में तुलसी बाबा भी अपने विचार से यही कहते हैं। कोई भी कार्य करने से पहले अथवा कदम उठाने से पहले उचित-अनुचित का निश्चित हीं विचार करना चाहिए। क्योंकि कर्म करने का सामर्थ्य तो सबके अंदर होता है। परंतु कुछ गलत हो जाए तो उसे बदल देना किसी के वश की बात नहीं।
मनुष्य न चाहते हुए भी अपने द्वारा गलत हुए कर्म से भी अनेंक परेशानी और दुख उठता है। जैसे जो व्यक्ति बिना विचार के बोलता है वह उसी के परेशानी का सबसे बड़ा कारण बनता है। क्योंकि समाज के अंदर जितने भी कलह होते हैं। क्यों ना कलह वह किसी भी स्थिति में और समुदाय के बीच हो। क्योंकि जिव्हा से निकले हुए शब्द आपसी कलह में सबसे बड़ा खेल करते हैं।
परिवारिक झगड़ा हो, पड़ोसी का झगड़ा हो अथवा कहीं भी आपसी मतभेद हो। सभी कलर रूपी झगड़े का शुरुआत कड़वाहट भरे शब्दों से होताहै। कोई इन सब बातों को नजर अंदाज कर जाता है। दूसरे को से क्या फर्क पड़ता है कुछ नहीं। कहते हैं वाणी इंसान से सब कुछ कर देता है। ऐसे में यदि वाणी पर संयम न हो तो आप स्वयं समझ सकते हैं कि उसका परिणाम क्या और कहां तक हो सकता है।
इन सब के पीछे देख तो पता चलता है कि किसी भी विषय के लिए विचार करना अत्यंत आवश्यक है। मनुष्य के अंदर वैसे भी इच्छा शक्ति बहुत होता है। यह इच्छा शक्ति उसे स्वार्थ के चरम सीमा तक पहुंचा देता है। स्वार्थ के चक्कर में वह अपनें-पराया तथा अपनें शब्दों को तौलना भूल जाता है। इसी कारण आजकल आपसी रिश्तों में खटास उत्पन्न होते हुए देखा गया है।
हमारा वेद पुराण ग्रंथ ज्ञान का समंदर है। जितना भी लिया जाए वह काम होगा। प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए ऐसे उत्तम विचारों को श्रवण करके अपने जीवन में आत्मसात करे। क्योंकि सभीं सफल होना चाहते हैं, और सफलता की चाबी उसके अपनें विचारों से ही बनेगा। जिस व्यक्ति का विचार शुद्ध होगा। निश्चित तौर पर उसके द्वारा किया गया प्रत्येक कर्म भी शुद्ध होगा। यह समाज भी उसी को भला कहता है।
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