भारतीय संस्कृति में पहले सिर्फ एक हीं विवाह होता था। कहते हैं सात जन्मों का रिश्ता। आज के समय सात जन्मों का रिश्ता महज एक कहावत बनकर प्रचलित है। कल और आज में मानव जमीन आसमान का अंतर हो गया हो।

पहले विवाह के बाद कसमें खाते थे, एक दूसरे का साथ निभाने के लिए हम सात जन्मों का साथ देंगे। आज विवाह से पहले अनेक कसमे वादे खाते हैं और शादी के बाद एक दूसरे की खुशियों को खाने लग जाते हैं। सनातन विवाह पद्धति वह पद्धति है जो सिद्धांत के ऊपर आधारित हैं। आज का जो लव मैरिज है यह महज खुले आसमान में तैरने का सपना देख कर होता है।
इसलिए शादी के बाद मतभेद उत्पन्न होता है। वास्तव में शादी एक दूसरे के लिए बंधन है, एक समाज का ऐसा बंधन जिसे न चाह कर भी एक दूसरे को निभाना पड़ेगा और निभाना चाहिए।
बहकना कौन नहीं चाहता, कमबख्त दिल तो बहकाने हीं काम किया करता है। यह दिल बहकाते हुए ऐसे मझधार में लेकर जाता है, जहां से निकलने का कोई रास्ता हीं नहीं होता। यह दिल! कितना दिल फेक है , इसी से पता चलता है कि व्यक्ति पूरी उम्र इस दिल को लेकर झटके खाते रहता है। प्रकृति में एक मौसम का कोई कल्पना कर सकता। शायद एक मौसम होता तो यह दुनिया हीं ना होता।
जीवन के अंदर सुख और दुःख यह प्रकृति के समान है इससे लड़ने के लिए हमेशा सबको तैयार रहना चाहिए। शादी लव मैरिज होगी या अरेंज मैरिज निभाना तो सबको चाहिए। समाज में विवाह एक ऐसा बंधन है जिसको तोड़ कर व्यक्ति पूर्व की भांति नया नहीं कर सकता। यदि दिल ने शुलि पर चढ़ा दिया है, तो चढ़े रहो दूसरा कोई उपाय नहीं है। यह मैं पूरे विश्वास के साथ कहता हूं, जैसे हीं तुम उतरोगे कोई और तुम्हें सूली पर चढ़ा देगा।
यह बात किसी विशेष किसी स्त्री अथवा पुरुष के लिए नहीं है। यह सब के लिए है, एक मकड़जाल के जैसा तुम जितना फर- फरआवोगे उतना हीं फंसते चले जाओगे।
इस गलती को दोनों ने किया है, इसका कीमत दोनों को चुकाना पड़ेगा। कोई एक कीमत चुकाये ऐसा नही होगा, इसके लिए कीमत दोनों को चुकाना होगा , दोनों मिलकर थोड़े-थोड़े खुशियों का कुर्बान करो और अपने जीवन को अंत तक जियो और साथ में जियो।
मैदान छोड़कर कभी भाग नहीं सकते , जहां जाओगे कमबख्त दिल तुम्हारा पीछा करता रहेगा। दिल तुम्हें उस वक्त तक सताते रहेगा जब तक की तुम उसे शांत न कर दो। अफसोस ना करो! एक इस प्रकार का दिल तुम्हारा नहीं है, ऐसा दिल तो धरती पर हर एक जीव का है।
एक कीट पतंगा अपने दिल के हाथों मजबूर रहता है, वह दिए के लौ को खाने के लिए दौड़ता है। वह सोचता है कुछ बड़ा मिलेगा, कुछ अच्छा मिलेगा। उसका दिल कुछ सोचने नहीं देता। वह कूद पड़ता है उस आग में, और क्या? उसके बाद उसका स्वाहा!
कमबख्त दिल है जो मानता नहीं। और यह जीव पूरी उम्र दिल फेक दिल का गुलामी करते रहता है। और यह अफसोस से कहना पड़ता है कि सौ जूते खाने के बाद भी हम दिल का हीं गुलामी करेंगे।
विवाह की प्रथा क्यों? सवाल बहुत बड़ा है उत्तर सुनने का हिम्मत और धीरज रखना होगा। यह सवाल सिर्फ जो विवाह करने वाले हैं उनके लिए नहीं है। यह सवाल और उत्तर तो समाज के हर एक व्यक्ति के लिए है।
कोई नाटक अथवा पिक्चर देखने में बहुत आनंद आता है, कारण उसमें हम नहीं होते। उसे बनाने वाला कोई और है और उसमें किरदार निभाने वाला भी कोई और है।
परंतु हमारे जीवन की जो फिल्म चल रही है उसके सब कुछ हम हीं है। थोड़ी सी चूक! हम अपने मूवी में क्लाईमैक्स कुछ और देना चाहते हैं और पता चलता है क्लाईमैक्स कुछ और बन गया। हम जाना तो कहीं और चाहते हैं परंतु परिस्थिति कहीं और ले कर चला जाता है। जब हम जाना नहीं चाहते तो भी स्थितियां जबरदस्ती ले जाने का प्रयत्न करती है।
कौन है जिसका दिल दर्द नहीं देता, हर व्यक्ति समझता है अपने दिल के फितरत को। सवाल फिर एक बार-विवाह क्यों और किसके लिए?
आजकल समाज में अनेक प्रकार की विवाह चर्चा में है। लव मैरिज, अरेंज मैरिज, कोर्ट मैरिज।
अभी अभी नया ट्रेंड शुरू हुआ है, व्हाट्सएप मैरिज, फेसबुक मैरिज, गार्डन मैरिज, रोड मैरिज, चार्ट मैरिज कुछ दिनों के बाद पता चलेगा कि पकौड़ा मैरिज भी आ जाएगा।
वास्तव में जीवन की शुरुआत शादी के बाद होता है, क्योंकि शादी के बिना जीवन को व्यर्थ माना जाता है समाज में। जीवन में शादी कितना महत्वपूर्ण है और शादी से संबंधित कितने प्रकार के सवाल उत्पन्न होते हैं, लेख में उन सवालों के साथ उत्तर की खोज कर करेंगे।
विवाह मजाक नहीं हो सकता। क्या विवाह के उपरांत स्त्री का शक्ति खत्म हो जाता है? अपने वैवाहिक जीवन को कैसे सुखमय बनाया जा सकता है? लव मैरिज नाड़ी जीवन के लिए घातक क्यों है?
यदि व्यक्ति के अंदर अशांति हो तो उसके सवाल कभी खत्म नहीं होते। यदि शंका हो अथवा कुतर्क करना हो तो हजारों सवाल पैदा किए जा सकते हैं। कोई भी सवाल के लिए कोई भी उत्तर दिया जा सकता है परंतु वास्तविक उत्तर हीं मन के सवाल के आगे पूर्णविराम लगा सकता है। :-
कोर्ट मैरिज- लव मैरिज अथवा अरेंज मैरिज
कोर्ट मैरिज- समाज के अंदर कोर्ट मैरिज की मान्यता पूर्ण रूप से मिला हुआ। समाज में आज के समय कोर्ट मैरिज आवश्यकता नहीं है एक जरूरत है। कोर्ट मैरिज प्रशासन के द्वारा लिया गया एक नियम है जिसे कोई भी प्रशासन शादी को मान्यता देता है। कोर्ट मैरिज को संक्षेप में कहें तो यह एक अरेंज मैरिज के जैसा है या इसे लव मैरिज भी कह सकते हैं।
क्योंकि कोर्ट में पहुंचने वाला , लव करके भी पहुंचता है और अरेंज करके भी। यदि आज के अनुसार से यदि विचार की बात करें तो लव मैरिज अथवा अरेंज मैरिज दोनों को हीं बाद में कोर्ट मैरिज का स्वरूप दिया जा सकता है।
विवाह तो ऐसा बंधन होता है जो व्यक्ति पहले कल्पना करता है कि किसी भी प्रकार कभी ना टूटे। हमारा मानना है कि जिस शादी के ऊपर सामाजिक बंधन नहीं होता वह पूर्ण रूप से मजबूत नहीं होता। इसका भी एक कारण है की व्यक्ति का मन चंचल स्वभाव का है। मन तो नित दिन नई आशाएं पैदा करता है और वह चाहता है सब पूरा हो जाए।
लव मैरिज- लव मैरिज को यदि दिल की पुकार से बात करें तो सबसे उत्तम है। परंतु दिल का पुकार तो रोज बदलता है। कुछ बदलने वाले दिल का क्या करेंगे जिसे कुछ आज तो अच्छा लगता है परंतु वही दो दिन के बाद उसके ऊपर उसका विचार बदल जाता है।
लव मैरिज के ऊपर चर्चा करें तो सबसे पहले इस पर विचार करना होगा कि यह लव करने वाला है कौन?
व्यक्ति के अंदर कौन है जो प्यार करता है? व्यक्ति के अंदर कौन है जो प्यार करके शादी करना चाहता है?
यह बहुत ही गंभीर विषय है, समाज इस बात से हमेशा चूक जाता है। लव मैरिज करने वाला व्यक्ति उस दिल की बात सुनकर लव मैरिज करना चाहता है, जो दिल रोज नित नए कल्पनाओं का जन्मदाता है।
जिस दिल की चाकरी करने में व्यक्ति का पूरा जीवन निकल जाता है और अंत में दिल का फितरत वही का वही रहता है। उसके बाद भी हम सिर्फ दिल की हीं सुना करते हैं। वह दिल न जाने कितने जगह सैकड़ों जूते खिला चुका है। वह और न जाने कितने जूते खिलाएगा और कहां-कहां खिलाएगा।
क्या करें हम तो दिल के हाथों मजबूर हैं, क्योंकि दिल का अपना फितरत बहुत मजबूत है। प्रेम विवाह करने वाला कौन है, वह सोचने वाला कौन है,यह बहुत बड़ा विषय है।
सिर्फ दिल से दिल का मिलन हो जाए और व्यक्ति शादी कर ले और पूरा उम्र साथ रह ले यह निश्चित तौर पर कहना मुश्किल होगा। क्योंकि व्यक्ति अपने दिल को खुश करने के लिए अनेक प्रकार के झूठ और फरेब का भी सहारा लिया करता है, जो शादी विवाह के उपरांत उजागर हो जाता है।
यहां कोई प्रेमी कह सकता है, मेरे अंदर झूठ और फरेब नहीं है। हम कहते हैं यह अच्छा बात है। आपके अंदर झूठ और फरेब नहीं है, परंतु आपके प्रेमी के अंदर झूठ और फरेब नहीं है इसका गारंटी क्या है? आपको भरोसा है अपने प्रेमी के ऊपर! यदि किसी वजह से वह भरोसा टूट गया तो पूरे जीवन भर के लिए दुखों की सूली पर लटका देगा। शादी एक वनवे रास्ता है जिधर से जाकर वापस नहीं आया जा सकता। यदि आप आना भी चाहते हो तो भी समाज आपको आने नहीं देगा।
विवाह के लिए सबसे आवश्यक
जीवन का सबसे महत्वपूर्ण फैसला विवाह है और जिस प्रकार मैंने ऊपर कहा है सभीं विवाह को कोर्ट मैरिज का स्वरूप दिया जा सकता है। उसी प्रकार हर प्रेमी अपने लव मैरिज को यदि अरेंज मैरिज का स्वरूप दे पाए तो वह ज्यादा उत्तम होगा। यह कह कर मैं लव मैरिज का समर्थन नहीं करता परंतु विवाह के लिए बंधन बहुत आवश्यक है।
जीवन अपने आप में कठिनाइयों भरा होता है यह जीवन से कभी नहीं जाएगा। लव मैरिज के अंदर एक दूसरे के साथ रहने के लिए वह बंधन नहीं होता, ऐसा बंधन जिसे वह तोड़ ना पाए। इसलिए लव मैरिज इतना मजबूत बंधन नहीं है। लव मैरिज को अपने आप से कोई एक प्रेमी भी अपना विवाह तोड़ देता है , परंतु अरेंज मैरिज में ऐसा नहीं होता। अरेंज मैरिज सामाजिक संबंधी के द्वारा होता है और उसे तोड़ने का अधिकार पहले समाज को है।
लव करना अलग बात है और लव करके विवाह करना अलग बात है। संसार में कोई भी वस्तु अच्छा लगे वह दिल को भा सकता है परंतु अच्छा लगने का मतलब यह नहीं कि उससे विवाह करके अपना जीवन उसके ऊपर कुर्बान कर दी जाए।
प्रेम करने के लिए
लव करने के लिए व्यक्ति के अंदर सिर्फ दिल फेक “दिल” चाहिए। जो अच्छा लग जाए उससे इश्क कर लिए। लव करने के लिए कोई जरूरी अलग से सामग्री की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि दिल जन्मजात तमन्नाओं को लेकर पैदा हुआ है, जब तक जिंदा रहेगा उसका तमन्ना नहीं मरने वाला है।
शादी करना सिर्फ लव करने के बराबर नहीं है। शादी करने का अर्थ है पूरे जीवन भर साथ रहना, अपनी खुशियों को कुर्बान कर के साथ रहना। आश्चर्य की बात है लव मैरिज के अंदर प्रेमी प्रेम को पाने के लिए जाता है, परंतु वहां जाने के बाद प्रेम जैसा कोई वस्तु मिलता हीं नहीं। क्योंकि जिस दिन प्रेमी से मोहब्बत हो गया प्रेम तो उसी दिन मिल गया उसके बाद क्या मिलेगा। उसके बाद क्या आशा लेकर प्रेम को पाने की इच्छा कर सकते हैं।
विवाह करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण जो विषय है वह है दोनों का आपसी विचारों का मिलन। दिल और सिद्धांत दोनों अलग-अलग होता है। सिद्धांत से कौन कहां कितना समझौता करेगा यह तो व्यक्ति स्वयं जानता है। और दिल तो अपने आप में एक फरेब है,कारण वह सिर्फ सपने देखता है।
जो प्रेम विवाह करके प्रेम को पाना चाहते हैं उनके लिए मैं एक बार फिर कहूंगा। जिस दिन प्रेम हुआ उसी दिन प्रेम मिल गया विवाह के उपरांत अब तो प्रेम का सिर्फ फ्रेम मिलेगा। क्योंकि जिस वस्तु को दिल प्राप्त कर चुका है वह वस्तु जब दोबारा मिलता है,तो उसे वह आनंद नहीं आता।
प्रेमी के सिद्धांत और विचार
दूसरे का विचार जानकर प्रेम नहीं हो सकता। क्योंकि हम किसी के अंदर नहीं जा सकते, और प्रेम की दुनिया में तो कभी नहीं जा सकते। अपने सभीं अवगुणों को छिपाकर दूसरे को प्रेम करना यह दिल का फितरत है। और कभी-कभी तो यह दिल उन अवगुणों को देखकर भी गुण मान बैठता है। क्या करें दिल का फितरत हीं ऐसा है। यहां यदि विचारों के मिलन के बाद प्रेम विवाह का बात आता है तो इसे उत्तम कह सकते हैं। प्रेम विवाह के बाद विशेष अधिक मामलों में पुरुष को वह परेशानी नहीं होता जो परेशानी स्त्री को होता है। क्योंकि पुरुष तो अपने घर में ही स्थित होता है, भारतीय समाज में विवाह के उपरांत स्त्रियां अपना घर छोड़कर पराए घर को अपना बनाती है।
यह विचार करने वाली बात है कि स्त्री तो ऑलरेडी अपना घर परिवार छोड़ चुकी है। वह एक पराए को अपना मानकर पीछे हो लेती है। वैसे हर व्यक्ति अपने अनुसार से फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है फिर भी विवाह जैसे बड़े फैसले में समाज और परिवार का होना बहुत हीं आवश्यक है। सनातन संस्कृति के विचार से प्रेम विवाह को विशेष विवाह में नहीं रखना चाहिए। प्रेम विवाह के ज्यादा मामले में दांपत्य जीवन विशेष सुख के परिस्थिति में नहीं पहुंच पाता।