वृद्धावस्था का टॉनिक, जो जीवन को जीने का विश्वास देता है, वह परम आवश्यक है। वृद्धावस्था में जब समाज धीरे-धीरे साथ छोड़ने लगता है, तब ऐसा प्रतीत होता है जैसे सभी अपने-अपने तरीके से पिंड छुड़ाने लगे हों। यद्यपि अनेक लोग दिलासा देने का कार्य करते हैं, कुछ उनमें से विश्वास जगाने का भी प्रयास करते हैं, परंतु कई बार किसी का भी उपदेश काम नहीं आता।

सनातन संस्कृति में परिवार के बुज़ुर्गों को अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में मान दिया गया है। प्राचीन काल में नौजवान अपने परिवार के वृद्धों को अपने से पृथक नहीं देखते थे। आज, जब सनातन संस्कृति पर अनेक प्रकार के आक्षेप लगाए जा रहे हैं, वहीं यदि गहराई से देखा जाए तो वास्तव में आज के समय में सनातन संस्कृति की अत्यधिक आवश्यकता है। यह संस्कृति न केवल वृद्धों को महत्वपूर्ण मानती है, बल्कि उन्हें सर्वोच्च स्थान देकर पूजनीय समझती है।
धरती पर अनेक संस्कृतियाँ मौजूद हैं, और सभी की अपनी-अपनी परंपराएँ, विचार और नियम हैं। धीरे-धीरे सनातन संस्कृति पर भी अन्य संस्कृतियों का प्रभाव पड़ने लगा है। जो युवा अपने किसी वृद्ध को घर के कोने में छोड़ देता है, वह यह भूल जाता है कि आने वाले समय में वही स्थिति उसके साथ भी घट सकती है।
विचार तंत्र कहता है कि आज के समय में चाहे कितना भी उत्तम विचारों वाला पुत्र क्यों न हो, वह श्रवण कुमार नहीं बन सकता, क्योंकि युग की वास्तविकता इतिहास के साथ बहुत कुछ बदल चुकी है। जिस गति से आज का मनुष्य अतीत को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहा है, उसी तरह वर्तमान भी शीघ्र ही अतीत बन जाएगा।
वृद्ध अपने अंदर विश्वास कैसे जगाए?
स्पष्ट शब्दों में कहें तो अपने अंदर विश्वास जगाने का सबसे सरल उपाय यह है कि संसार से सब प्रकार की अपेक्षाएँ छोड़ दें। अपने भीतर जितना भी विश्वास शेष है, उसी विश्वास के सहारे जीवन पर्यंत जीने का संकल्प लें। क्योंकि दूसरों पर विश्वास करते समय यह ध्यान रखें कि सामने वाला व्यक्ति निश्चित रूप से किसी न किसी समय आपका विश्वास तोड़ सकता है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति की निष्ठा की एक सीमा होती है, और उसकी निष्ठा उसकी अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं पर निर्भर करती है।
अब प्रश्न उठता है – ऐसी स्थिति में वृद्ध अपने आप में विश्वास कैसे बनाए रखे?
सनातन सत्य कहता है कि वृद्धावस्था में स्वस्थ और आनंदित जीवन जीना एक चुनौती है। इस चुनौती को पार करने के लिए आवश्यक है कि वृद्ध व्यक्ति सबसे पहले स्वयं को अपना लक्ष्य बनाए। दूसरों से मिला विश्वास केवल कुछ समय के लिए होता है, वह रेत की दीवार की तरह ढह सकता है। इसलिए उस विश्वास को साधन बनाकर अपने अंदर ऐसा आत्मविश्वास उत्पन्न करें जो किसी दूसरे पर निर्भर न हो।
वृद्धावस्था और टूटता विश्वास
युवावस्था में जब व्यक्ति अस्वस्थ होता है, तो औषधियों की सहायता से पूर्ववत स्वस्थ होकर नया जीवन जी सकता है। किंतु वृद्धावस्था में शरीर प्रतिदिन क्षीण होता जाता है। इतिहास गवाह है कि वृद्धावस्था को रोकने के लिए अनेक लोगों ने अनेक प्रकार के प्रयास किए, परंतु कोई सफल नहीं हुआ और न भविष्य में कोई हो सकेगा।
मनुष्य स्वस्थ और आनंदित जीवन का प्रयत्न अवश्य कर सकता है, परंतु शरीर पर पड़ने वाले प्रकृति के प्रभाव को रोक नहीं सकता।
वृद्धावस्था में आनंदित जीवन जीने का एकमात्र सरल उपाय है – अपने कर्मों का विश्लेषण करें और ईश्वर से प्रार्थना करें।
“हे ईश्वर! तू महान है। तू भले ही दृष्टिगोचर नहीं होता, पर तेरी महानता हर जगह दृष्टिगोचर होती है। यदि मेरे कर्मों के विश्लेषण में मुझसे कोई त्रुटि हो जाए, तो भी तेरे विश्लेषण में कोई त्रुटि नहीं होगी।
हे ईश्वर! यह प्रकृति मेरे साथ कुछ भी करे, मैं उसे स्वीकार करता हूँ। तू मेरे अंदर विश्वास बनकर विचरण कर। मुझे हौसला दे कि जब तक जीवित हूँ, शरीर को स्वस्थ रखते हुए तेरी भक्ति कर सकूं।
हे प्रभु! मेरे इस अंत समय में तू मेरा सहायक बन।”
ईश्वर से अपने मन की सच्ची और भावपूर्ण प्रार्थना करें। ऐसी प्रार्थना कि ईश्वर करुणा से भर जाए और स्वयं कहे – “हे मानव! मैं तेरे साथ हूँ।”
ईश्वर किसी भिन्न रूप में नहीं आता; वह तो आपके भीतर, आपके विश्वास के रूप में ही प्रकट होता है।
अब तक जिसके लिए जीते आए, उसके लिए कोई अफसोस न करें। आज से अपने लिए जीने का संकल्प लें। हमारे पूर्वजों ने कहा है – “ईश्वर ने कभी आपका साथ नहीं छोड़ा; वास्तव में तो आपने ही ईश्वर को छोड़ रखा है।”
ईश्वर को पकड़ लीजिए – ऐसा कि वह फिर कभी विलुप्त न हो।
जीवन को जीने के लिए आत्मविश्वास अत्यंत आवश्यक है। यह केवल वृद्धावस्था की बात नहीं, बल्कि हर आयु में आवश्यक है। विश्वास ही व्यक्ति को जीवंत बनाता है। जब तक आपके भीतर विश्वास है, तब तक जीवन है; यदि विश्वास नहीं, तो जीवन मृतवत् हो जाता है।
स्वामी विवेकानंद जी बार-बार कहते थे –
“उठो, जागो! अभी बहुत कुछ बाकी है। अब तक तुमने संसार के लिए जिया है, अब अपने लिए जियो।”
किसी बाहरी व्यक्ति का विश्वास पाने में बुद्धि मत लगाइए; उस ईश्वर के समक्ष नतमस्तक हो जाइए। यदि वह दृष्टिगोचर नहीं होता, तो उससे कहिए –
“हे ईश्वर! तू मुझे दिखाई नहीं देता, तू बोल – मैं क्या करूं?”
यदि वह विश्वास में नहीं आता, तो बार-बार पुकारिए –
“हे ईश्वर! तेरा विश्वास मेरे भीतर नहीं उतरता, तू बता मैं क्या करूं।”
विचार तंत्र कहता है कि आत्मा ही परमात्मा का अंश है। अपने आत्मरूप ईश्वर के पीछे लग जाइए – वह आत्मा आपको उसी ईश्वर तक पहुँचा देगी।
यदि जीवन में करने की सारी इच्छाएँ समाप्त हो चुकी हैं, तो आज से कुछ नया करने का विश्वास उत्पन्न कीजिए।
महान भक्त बनने की चिंता छोड़ दें। ईश्वर आपको किस श्रेणी में रखेगा, यह उसका कार्य है। आप बस इतना कहें –
“हे ईश्वर! मैं जैसा भी हूँ, जिस रूप में हूँ, तू मुझे उसी रूप में स्वीकार कर।”
इस प्रकार नियमित प्रार्थना करने पर ईश्वर अवश्य प्रसन्न होगा।
शायद पढ़कर विश्वास न हो, परंतु यदि इसे निरंतर दस दिन तक अपनाएँ, तो आपके जीवन में नया संचार उत्पन्न होगा। आप अनुभव करेंगे कि अब तक आप अंधकार में थे।
जीवन को जीने के लिए विश्वास आवश्यक है, किंतु वृद्धावस्था में यह विश्वास नितांत आवश्यक हो जाता है। ईश्वर में विश्वास आपके भीतर की शारीरिक पीड़ा को कम करेगा, समय से पूर्व आने वाली वृद्धावस्था को रोकेगा, और संभव है कि शेष बचा हुआ युवापन फिर से लौट आए। अतः वृद्धावस्था की इस चुनौती को स्वीकार करें और ईश्वर की आराधना में मन लगाएँ – यही सबसे सरल और सुखद उपाय है।
वृद्धावस्था में स्वस्थ जीवनशैली
यह जानना भी आवश्यक है कि किस प्रकार की जीवनशैली अपनाकर वृद्धावस्था में स्वयं को स्वस्थ रखा जा सकता है।
उम्र बढ़ने के साथ कई बुज़ुर्ग अपने शरीर के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। उनका मानना होता है कि इस उम्र में फिट रहकर करेंगे क्या — यह तो भजन-कीर्तन की उम्र है। परंतु सच्चाई यह है कि शरीर की उपेक्षा से उत्पन्न बीमारियाँ न केवल उन्हें स्वयं कष्ट देती हैं, बल्कि पूरे परिवार को भी परेशानी में डालती हैं।
यदि वे स्वयं को स्वस्थ रखें, तो अपने साथ परिवार को भी सुखी रख सकते हैं।
खानपान और व्यायाम
अपने खानपान को नियमित रखें। हल्का किन्तु पौष्टिक भोजन करें।
यह धारणा छोड़ दें कि वृद्धावस्था में बार-बार भोजन नहीं करना चाहिए।
दिन में हल्का भोजन तीन-चार बार लिया जा सकता है।
शरीर को गतिशील बनाए रखें। यदि हाथ हिलते हैं, तो प्रतिदिन आधा घंटा हाथ हिलाने का अभ्यास करें।
यह छोटा-सा व्यायाम भी शरीर में रक्तसंचार को बनाए रखेगा।
हम बचपन से सुनते आए हैं कि हमारा शरीर एक मशीन है – यदि मशीन लंबे समय तक निष्क्रिय रहे, तो वह जाम हो जाती है।
उसी प्रकार हमारा शरीर भी तभी तक स्वस्थ रहता है जब तक वह सक्रिय रहता है।
प्रतिदिन आधा या एक घंटा टहलने वाले लोगों में, बैठे रहने वालों की तुलना में, कैंसर और हृदय रोगों का खतरा नगण्य पाया गया है।
विभिन्न सर्वेक्षणों से यह सिद्ध हुआ है कि नियमित व्यायाम करने वालों की मृत्यु-दर, निष्क्रिय लोगों की अपेक्षा बहुत कम होती है।
विचार तंत्र परिवार की ओर से हम आप सभी के स्वस्थ, सुखी और आनंदमय जीवन के लिए शुभकामनाएँ और ईश्वर से हार्दिक प्रार्थना करते हैं।